अपक्षय - पृथ्वी के वाह्य भाग में प्राप्त होने वाली चट्टानों के अपने ही स्थान पर टूटने टूटने की प्रक्रिया अपक्षय कहलाती है जिसमें चट्टाने छोटे-छोटे कणों में परिवर्तित हो जाती है।
अपक्षय को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं अपक्षय विभिन्न प्रकार की भौतिक , रसायन तथा जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम है जिसका अध्ययन हम मुख्य बिंदुओं के अंतर्गत करते हैं।
जलवायु - जलवायु का मुख्य घटक तापमान, वर्षा, पवन की गति , आद्रता आदि होती हैं यह समस्त कारक किसी भी चट्टान को लगातार प्रभावित करते रहते हैं तथा अपक्षय में इनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका भी प्राप्त होती है ।
समय - समय अपक्षय की दीर्घकालिक प्रक्रिया है अनुमान लगाया जाता है कि मैदानी क्षेत्रों में लगभग 1000 वर्ष में केवल 1 सेंटीमीटर पदार्थों का ही अपक्षय होता है ।
पैतृक चट्टान - चट्टानों की संरचना या संगठन से इस बात का निर्धारण किया जाता है कि अपक्षय क्रिया की दर का प्रभाव क्या होगा यदि चट्टाने नरम तथा परतदार हैं तो इनका शीघ्र अपक्षय हो जाता है जबकि यदि चट्टाने कठोर , मजबूत हैं तो यह अपक्षय की प्रक्रिया को कम कर देती है ।
ढ़लान - ढ़लान का भी इस पर मुख्य प्रभाव पड़ता है क्योंकि उच्च ढलान वाले पर्वतीय प्रदेशों में यह क्रिया अत्यंत तीव्र होती है जबकि मैदानी क्षेत्रों में यह क्रिया कि दर न्यूनतम हो जाती है अर्थात अत्यधिक ढलान प्रदेशों का निम्न ढलान प्रदेशों की तुलना में अपक्षय अधिक होता है ।
जैविक घटक - जैविक घटक को 2 वर्गों में विभाजित करके अध्ययन किया जाता है पादप तथा जंतु
पादप अपनी जड़ों के विस्तार क्रम में चट्टानों को तोड़ देते हैं तथा जड़े चट्टानों को जकड़ कर भी संगठित रखने में भी सहायता करती हैं अर्थात अपक्षय को बढ़ाती है तथा घटाती भी है परंतु घटाने का प्रभाव अधिक होता है ।
जंतु समूह तथा मानव लगातार खुदाई आदि प्रक्रिया द्वारा चट्टानों को तोड़ देता है इसलिए अपक्षय क्रिया में वृद्धि हो जाती है ।