भक्तिकाल

भक्तिकाल (वि0सं0 1375-1700)

                भक्तिकाल का पुराना नाम-पूर्व मध्यकाल

                पूर्व मध्यकाल का भक्तिकाल की संज्ञा-आचार्य शुक्ल ने दिया।

                जार्ज ग्रियर्सन ने भक्ति काल को स्वर्ण काल कहा।

                भक्ति काल के दो खण्ड-निर्गुण और सगुण

                निर्गुण भक्ति के दो खण्ड-ज्ञान मार्ग और प्रेम मार्ग

                सगुण भक्ति के दो खण्ड-कृष्ण मार्गी और राम मार्गी

                ज्ञान मार्गी शाखा के प्रवर्तक-कबीर जी।

                प्रेम मार्गी शाखा के प्रवर्तक-मलिक मुहम्मद जायसी

                राम भक्ति के प्रवर्तक-तुलसीदास जी

                कृष्ण भक्ति के प्रवर्तक-सूरदास जी

                कबीर जी के साखी, शबद, रमैनी का संकलन बीजक कहलाता है।

                पदमावत जायसी जी की कालजयी रचना है जो अवधी भाषा में लिखी गयी है।

                अखरावट, आखिरी कलाम, चित्र लेखा आदि जायसी जी की अन्य रचनाएँ हैं।

                सेना, पीपा, धन्ना, रैदास, नानक, जयनाथ आदि भी कबीर जी के अलावा संत कोटि में गिने जाते है।

                संत कवियों ने आत्मा को पत्नी तथा परमात्मा को पति स्वीकार करके साधना किया है।

                सूफी संतों (कवियों) ने आत्मा को प्रेमी तथा परमात्मा को प्रेमिका मानकर काव्य रचना की है।

                ‘तुलसीदास’ का अर्थ है- तु-राम, ल-लक्ष्मण, सी -सीता के दास।

                गोस्वामी का अर्थ है-गो-इन्द्रिय तथा स्वामी- मालिक।

                गोस्वामी जी ने रामचरित मानस की रचना अवधी में और अन्य रचनाएं ब्रज भाषा में की है।

                रामचरित मानस के अलावा-गीतावली, कवितावली, दोहावली, वैराग्य संदीपनी, कृष्णा गीतावली, रामलला नहछू आदि रचनाएं भी गोस्वामी जी की है।

                सूरदास जी ने सूरसागर, सूर सारावली और साहित्य लहरी की रचना की है। ?

                सूरसागर का उपजीबकाव्य भगवत का दशमस्कन्ध है।

                विशिष्टता द्वैतवाद के संस्थापक-श्री रामानुजाचार्य ही हैं, जिसके शिष्य श्री रामानन्द जी हैं।

                द्वैतवाद के संस्थापक - श्री माधवाचार्य जी है।

                रूद्र सम्प्रदाय के संस्थापक-विष्णु स्वामी जी हैं।

                द्वैताद्वैतवाद/भेदाभेदवाद के प्रचारक-निम्बाकाचार्य हैं। आपने सनक, सम्प्रदाय की स्थापना की।

                शुद्धाद्वैतवाद की स्थापना-बल्लभाचार्य ने किया इन्होंने ही स्वतंत्र सम्प्रदाय की स्थापना की।

                बल्लभाचार्य ने ही मत को पुष्टि मार्ग कहा जाता है।

                श्रृंगार रस मण्डन ‘द्विमंडन प्रकृति’ बल्लभाचार्य जी के कृति अंश हैं।

                नाभादास जी ने अष्टषाम एवं भक्तमाल की रचना की।

                अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ ने की थी।
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