रीतिकाल (वि0सं01700-1900 तक)
रीतिकाल का पूर्व नाम-उत्तर मध्य काल
उत्तर मध्य काल को रीति काल-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा।
रीति काल को श्रृंगार काल विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने कहा।
रीति काल को ‘कलाकाल’-श्री रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ ने कहा।
रीति काल को अलंकृत काल-मिश्र बंधुओं ने कहा।
कवि प्रिया, रसिक प्रिया, रामचन्द्रिका, विज्ञान गीता, रतन बावनी, जयमयंक जस, चन्द्रिका, आचार्य केशव के रचनाएं हैं।
राम चन्द्रिका को छंुदों का ‘अजायबघर’ कहा जाता है।
आचार्य केशव को कठिन काव्य का प्रेत कहा जाता है।
रीति काल को (रीति बद्ध, रीति सिद्ध और रीति मुक्त) तीन खण्डों में बाँटा है-विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने।
रीतिबद्ध के कवि
चिन्तामणि, मतिराम, देव, जसवंत, कुपति मिश्र।
मण्डन, सोम, भिखारी दूलह, ग्वाल सुरति मिश्र।
रीति सिद्ध कवि
बेनी, शम्भू, बिहारी, कृष्णा, रसनिधि, हठी और राम नेवाज।
पनसिज, बृंद, देव, द्विज, विक्रम, सेनापति और राम सहाय।
रीति मुक्त
घन, ठाकुर, बोधा और आलम।
रीति मुक्त के ए कवि जालम।
कवि कुलकल्परू, श्रृंगारमंजरी, काव्य विवेक, काव्य प्रकाश- आचार्य चिंतामणि की रचनाएं हैं।
अलंकार प्रकाश, शिवराज भूषण, छत्रशाल दशक, शिवा बावनी -भूषण की रचनाएं है।
गंगा लहरी, प्रबोध पचासा, जयदिवनोद कलि पचीसी-पद्माकर की प्रसिद्ध रचनाएं हैं।
इश्कनामा, विरह वारीश-बोधा की प्रसिद्ध रचना हैं।
बिहारी सतसई -बिहारी की प्रसिद्ध रचना है।
सुजान चरित, यमुना यश, कृपाकंद निबंध-घनानंद की रचनाएं है।