प्रगतिवाद

प्रगतिवाद (1936 ई0-1942ई0)

                प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना-1936 ई0 लखनऊ में प्रथम अधिवेशन के प्रथम अध्यक्ष मुंशी प्रेमचंद्र जी थे।

                सन् 1934 ई0 में गोर्की के नेतृत्व में रूस में ‘सोवियत लेखक संघ’ की स्थापना हुई। यह विश्व का पहला लेखक संगठन था।

                प्रगतिवाद का सैद्धान्तिक आधार माकर््स वाद का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। राजनीति के क्षेत्र में जो समाजवाद या साम्यवाद है। साहित्य के क्षेत्र में वही ‘प्रगतिवाद’ है।

                डाॅ0 बच्चन सिंह ने सुमित्रा नंदन पंत की रचना ‘युगवाणी’ को खड़ी बोली का प्रथम प्रगतिवादी काव्य माना है।

                रामधारी सिंह दिनकर के काव्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना तथा प्रगतिवादी चेतना दोनों विद्यमान थी।

                रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को ‘समय का सूर्य’ तथा ‘अधैर्य का कवि’ भी कहा जाता है।

                दिनकर जी ने मैथिली शसरण गुप्त के सामने स्वयं को जहाज डिप्टी राष्ट्र कवित माना है।

                दिनकर जी को ‘उर्वशी’ महाकाव्य के लिए सन 1972 ई0 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ था। इसे गीति नाट्य भी माना जाता है।

                रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कृतियाँ-रेणुका (1935), हुंकार (1939), रसवंती (1946), द्वन्द्वगीत (1940), कुरूक्षेत्र (1946)-प्रबन्ध रचना, सामधेनी (1947), रश्मिरथी (1952)-खण्ड काव्य, नील कुसुम (1954), दिल्ली, उर्वशी (1961) गीति नाट्य, परशुराम की प्रतीक्षा (1963)

                आत्मा की आँखे (अंग्रेजी की प्रयोगशील अविताओं का अनुवाद) (1964), हारे के हरि नाम, धूप और धुआँ (1951), नीम के पत्ते, इतिहास के आँसू (1951)

Posted on by