प्रमुख प्रगतिवादी कवि-2

नागार्जुन की खड़ी बोली में सर्वप्रथम प्रकाशित रचना ‘राम के प्रति’ जो सन् 1935 ई0 में लाहौर से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका ‘विश्व बन्धु में’ छपी थी।

                नागार्जुन की राजनीतिक कविताएं-बादल को घिरते देखा है, पाषाणी, सिंदूर  तिलकित भाल, तुम्हारी दंतुरित मुस्कावन, पाँच वृत भारत माता के, कालिदास, हरिजन गाथा, अकाल और उसके बाद।

                शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की रचनाएं-हिल्लोल, जीवन के गावन, युग का मोल, प्रलय सृजन विश्वास बदलता ही गया विन्घ्य हिमालय, मिट्टी की बारात, वाणी की व्यथा, पर आँखे नही भरी, हम पक्षी उन्तुक्त गगन के।

                वासुदेव सिंह ‘त्रिलोचन’ की रचनाएं-धरती गुलाब और बुलबुल, दिगन्त, ताप के ताए हुए दिन, शब्द, उस जनपद का कवि हूँ, अरधान, तुम्हें सौंपता हूँ फूल नाम है एक, अनकहनी भी कुछ कहनी है।

                ‘राघेय राघव’ त्रयंबक वीर राघावाचार्य की रचनाएं -अजेय खण्डहर, मेधावी, पांचाली

                अजेय खण्डहर में तीन शीर्षक-झंकार, ललकार, हुंकार।

                रागेय राघव के मुक्तक काव्य-पिछलते पत्थर, राह का दीपक।

प्रयोगवाद और नयी कविता

                प्रयोगवाद का आरम्भ सन 1943 ई0 में अज्ञेय जी के सम्पादकत्व में प्रकाशित तार सप्तक से माना जाता है।

                तार सप्तक में सात कवि संग्रहीत हैं।

      सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन को ‘अज्ञेय’की उपाधि जैनेन्द्र ने दिया था।

                प्रयोगवाद शब्द का प्रथम प्रयोग नंद दुलारे बाजपेयी ने प्रयोगवादी रचनाएं शीर्षक निबंध में किया।
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