भारत में यूरोपियों का आगमन (भाग-5)

       1602 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई और डच संसद में एक  चार्टर स्वीकार करके कंपनी को युद्ध छेड़ने, संधि करने, इलाके जीतने और किले बनाने के लिए अधिकार दे दिए। डचों की खास दिलचस्पी भारत में नहीं बल्कि इंडोनेशिया के जावा, सुमात्रा और  और स्पाइस आइसलैंड जैसेद्वीपों में थी, जहां मसाले खूब पैदा होते थे। जल्द ही उन्होंने मलय जलडमरूस्थल और इंडोनेशियाई दीपों से पुर्तगालियों को खदेड़ दिया। 1623 में इन क्षेत्रों पर अधिकार करने के प्रयास कर रहे अंग्रेजों को हराया। उन्होंने पश्चिमी भारत में गुजरात के सूरत, भरूच, कैंबे और अहमदाबाद, केरल के कोचीन, मद्रास के नागपट्टनम, आंध्र प्रदेश के मुसलीपट्टम, बंगाल के चिनसुरा, बिहार के पटना और उत्तर प्रदेश के आगरा नगरों में भी व्यापार केंद्र खोले। 1658 में उन्होंने पुर्तगालियों से श्रीलंका को भी जीत लिया।

         एशियाई व्यापार पर अंग्रेज व्यापारियों की लालच भरी निगाहें जमी थी। पुर्तगालियों की सफलता मसालों, मलमल, रेशम, सोने, मोतियों और दवावों और से भरे उनके जहाजों और इन से प्राप्त भारी मुनाफों ने अंग्रेज व्यापारियों की आंखें चकाचौंध कर दी थी। वे इस मुनाफा देने वाले व्यापार में शामिल होने के लिए बेचैन हो गए। 1599 मर्चेंट एडवेंचर्स नाम से जाने जाने वाले कुछ व्यापारियों ने पूर्व से व्यापार करने के लिए कंपनी बनाई इस कंपनी को ईस्ट इंडिया कंपनी कहा गया।

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