भारत में यूरोपियों का आगमन (भाग-6)

      31 दिसंबर 1600 महारानी एलिजाबेथ ने एक रॉयल चार्टर के द्वारा पूर्व से व्यापार करने का एकमात्र अधिकार दे दिया। 1608 में इस कंपनी ने भारत के पश्चिमी तट पर सूरत में एक फैक्ट्री खोलने का निश्चय किया। तब व्यापारिक केंद्रों को फैक्ट्री नाम से भी जाना जाता था। कंपनी ने तब कैप्टन हॉकिंस को जहांगीर के दरबार में शाही आज्ञा लेने के लिए भेजा। परिणाम स्वरूप एक शाही फरमान के द्वारा पश्चिमी तट की अनेक जगहों पर अंग्रेज कंपनी को फैक्ट्रियां खोलने की आज्ञा मिल गई। मगर इस छूट से ही अंग्रेज संतुष्ट ना थे।

         1615 में उनका दूत, सर टॉमस रो, मुगल दरबार में पहुंचा। रो मुगल साम्राज्य के सभी भागों में व्यापार करने और उसे खोलने का अधिकार देने वाला एक शाही फरमान जारी कराने में सफल रहा। 1622 में जब सम्राट चार्ल्स द्वितीय ने एक पुर्तगाली राजकुमारी से शादी की तो पुर्तगालियों ने उसे मुंबई का दीप दहेज में दे दिया। अंततः गोवा, दमन और दीव को छोड़कर पुर्तगालियों के हाथ से भारत में उनके कब्जे वाले सारे इलाके निकल गए। इंडोनेशिया के दीपों से हो रहे मसालों के व्यापार में भागीदारी को लेकर अंग्रेज कंपनी की डच कंपनी से ठन गई। इन दो शक्तियों के बीच रह-रहकर होने वाली लड़ाई 1654 से आरंभ हुई और 1667 में तब समाप्त हुई जब अंग्रेजों ने इंडोनेशिया पर सारे दावे छोड़ दिए और बदले में डचों ने भारत की अंग्रेज बस्तियों को न छूने का वादा किया।

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