वाणिज्यिक नीति
1600 से 1757 तक भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका एक ऐसे व्यापारिक निगम की थी जो भारत में माल या बहुमूल्य धातुएं लाता था तथा उसके बदले कपड़े, मसाले आदि भारतीय माल लेकर उन्हें विदेशों में बेचता था। इसके मुनाफे का मुख्य स्रोत विदेशों में भारतीय माल का विक्रय था। स्वाभाविक था कि कंपनी ब्रिटेन और दूसरे देशों में भारतीय माल के लिए नए बाजार लगातार खोजती रहती थी। इस प्रकार उसने भारतीय मार्लों का निर्यात बढ़ाया तथा उनके उत्पादन को प्रोत्साहन मिला। यही कारण था कि भारतीय शासक भारत में कंपनी द्वारा फैक्ट्रियों की स्थापना को ना सिर्फ सह लेते थे बल्कि प्रोत्साहित भी करते थे।
ब्रिटिश उद्योगपति ब्रिटेन में भारतीय वस्त्रों की लोकप्रियता से ईर्ष्या करते रहे। वस्त्रों का फैशन एकाएक बदल गया तथा अंग्रेजों के खुर्दरे ऊनी कपड़ों की जगह हल्के सूत्री वस्त्रों ने ले ली। प्रसिद्ध उपन्यास रॉबिंसन क्रूसो के लेखक डैनियल डिफॉे की शिकायत थी कि 'भारतीय वस्त्र हमारे घरों, हमारे केाच्छो तथा हमारे शयनकक्ष मैं प्रवेश कर चुके हैं। पर्दे, गद्द्दे, कुर्सियां और अंत में हमारे बिस्तर भी मलमल या भारतीय वस्तुओं के अलावा कुछ नहीं रहे'।
भारतीय मालों के ब्रिटेन में विक्रय को कम करने या समाप्त कराने के लिए ब्रिटिश उद्योगपतियों ने अपनी सरकार पर दबाव डाला। 1720 तक छापेदार या रंगे सूती वस्त्रों के व्यापार पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून बन चुके थे। 1760 में एक भद्र महिला को आयातित रुमाल रखने पर 200 जुर्माना देना पड़ा।