भारत में अंग्रेजों की आर्थिक नीति (भाग-2)

       भारत के साथ कंपनी के व्यापारिक संबंधों में 1757 के प्लासी युद्ध के बाद एक गुणात्मक परिवर्तन आया। अब बंगाल पर अपने राजनीतिक नियंत्रण के सहारे कंपनी भारतीय व्यापार और उत्पादन पर एकाधिकार पूर्ण नियंत्रण  स्थापित कर सकती थी और अपना भारतीय व्यापार भी बढ़ा सकती थी। इसके अलावा कंपनी ने भारतीय मालों का निर्यात बढ़ाने के लिए बंगाल से प्राप्त राजस्व का भी उपयोग किया। 1750-51 में भारतीय कारखानेदारों ने ब्रिटेन को 15 लाख पौंड का भारतीय माल निर्यात किया था, जिसे कंपनी की गतिविधियों के कारण 1797-98 तक बढ़कर 58 लाख पौंड हो जाना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ।

        कंपनी ने अपनी राजनीतिक शक्ति का उपयोग करके बंगाल के बुनकरों पर अपनी शर्तें लादीं और उन्हें अपना माल कम तथा निर्धारित दामों के साथ साथ घाटे पर भी बेचने के लिए बाध्य किया गया। इसके अलावा अब उन्हें श्रम की आजादी भी नहीं रही। उनमें से अनेकों कंपनी के लिए कम मजदूरी पर काम करने को मजबूर किए गए तथा भारतीय कारखानेदारों के लिए उनके काम करने पर रोक लगा दी गई। कंपनी ने अपने भारतीय या विदेशी प्रतिद्वंदी व्यापारियों को बाहर कर दिया तथा बंगाल के दस्तकारों को अधिक मजदूरी या दाम देने से उन्हें रोक रखा।

        कंपनी के नौकरों ने कच्चे कपास की बिक्री पर एक अधिकार कर लिया तथा इसके लिए वह बंगाल के बुनकरों से मनमाने दाम वसूलने लगे। इस तरह खरीदार तथा विक्रेता दोनों ही रूप में घाटे में रहे। साथ ही इंग्लैंड में भारतीय वस्तुओं पर भारी आयात शुल्क भी देनी पड़ती थी। ब्रिटिश सरकार अपने उभरते हुए मशीन उद्योग को सुरक्षा देने पर अडी थी क्योंकि उसके माल अभी भी सस्ती और बेहतर भारतीय माल का मुकाबला नहीं कर सकते थे। फिर भी भारतीय मालों केी कुछ साख बनी रहे। भारतीय हस्तशिल्प को असल धक्का 1813 के बाद लगा जब उसके हाथों से ना केवल विदेशी बाजार छीन लिया गया बल्कि भारतीय बाजार में भी उसके लिए कोई जगह नहीं रह गई।

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