कंपनी के व्यापारिक प्रभाव का विस्तार (भाग-2)

      1668 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने पुर्तगाल से मुंबई का  द्वीप प्राप्त किया और उसकी तत्काल किलेबंदी कर दी। मुंबई के रूप में अंग्रेजों को एक बड़ा और आसानी से रक्षा करने योग्य बंदरगाह प्राप्त हुआ। इस कारण से और क्योंकि उस वक्त उभरती हुई मराठा शक्ति अंग्रेजों के व्यापार के लिए खतरा पैदा कर रही थी। पश्चिमी तट पर कंपनी के हेड क्वार्टर के रूप में सूरत का स्थान जल्द ही मुंबई ने ले लिया।

        पूर्वी भारत मैं अंग्रेज कंपनी ने अपनी आरंभिक फैक्ट्रियों में से एक की स्थापना 1633 में उड़ीसा में की थी। 1651 में उसे बंगाल के हुगली नगर में व्यापार की इजाजत मिल गई। तब कंपनी ने जल्द ही पटना, बालासोर, ढाका और बंगाल-बिहार के दूसरे स्थानों पर भी फैक्ट्रियों खोल दी। अब उसकी इच्छा थी कि बंगाल में उसकी एक स्वतंत्र बस्ती होनी चाहिए। अब वह भारत में राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के सपने देख रही थी, ताकि मुगलों को मजबूर करके व्यापार में मनमानी करने की छूट ले ली जाए।

        भारतीयों को अपना माल सस्ता बेचने और कंपनी का माल महंगा खरीदने के लिए मजबूर किया जा सके।प्रतिद्वंदी यूरोपीय व्यापारियों को बाहर रखा जाए और कंपनी का व्यापार भारतीय राजाओं की नीतियों से स्वतंत्र रहकर जारी रहे। राजनीतिक सत्ता स्थापित करके कंपनी भारतीय राजस्व पाने और इस तरह देश को इसी के साधनों से जीतने की आशा कर सकती थी।

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