1687 में कंपनी का डायरेक्टरों ने मद्रास के गवर्नर को सलाह दी कि-
"वह एक ऐसी नागरिक और सैनिक शक्ति स्थापित करें और राजस्व को सुरक्षित और इतना बड़ा स्रोत बनाएं कि भारत में एक बड़े मजबूत और हमेशा हमेशा के लिए सुरक्षित है ब्रिटिश राज्य की नीव् डाली जा सके।"
1689 में उन्होंने घोषणा की कि-
"हमारे राजस्व में वृद्धि हमारा उतना ही बड़ा उद्देश्य है जितना कि हमारा व्यापार। जिस समय दुर्घटनाएं हमारे व्यापार में बाधा डाल रही हो यही वस्तु है जो हमारी शक्ति को बनाए रख सकेगी। यही वस्तु है जो भारत में हमें एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगी।"
1686 में जब अंग्रेजों ने हुगली को तहस-नहस कर दिया और मुगल सम्राट के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी तब दोनों के बीच शत्रुता की शुरुआत हो गई। पर अंग्रेजों ने स्थिति को पूरी तरह गलत समझा था और मुगलों की शक्ति को कम करके आंका था। औरंगजेब के शासन में मुगल साम्राज्य अभी भी ईस्ट इंडिया कंपनी की मामूली ताकत पर बहुत भारी था। युद्ध का अंत अंग्रेजों के लिए घातक रहा उन्हें बंगाल स्थित उनकी फैक्ट्रियों से खदेड़ दिया गया और वह गंगा के मुहाने के एक द्वेीप में शरण लेने के लिए बाध्य हो गए जो बीमारियों का घर था। उनका सूरत, मुसलीपटटम और विशाखापट्टनम स्थिति फैक्ट्रियों पर भी कब्जा हो गया और मुंबई स्थित उनके किले पर घेरा पड़ गया। यह देखकर कि अंग्रेज अभी मुगल शक्ति से लड़ने में समर्थ नहीं है, उन्होंने एक बार फिर झुककर दरबार में हाजिरी बजाई और प्रार्थना की कि 'उन्होंने जो अपराध किए हैं उनके लिए उन्हें क्षमा किया जाए।' उन्होंने भारतीय शासकों के संरक्षण में व्यापार करने की इच्छा प्रकट की। जाहिर है कि उन्हें सबक मिल चुका था। मुगल सम्राट से व्यापार संबंधी छूट लेने के लिए एक बार फिर चापलूसी और विनम्रता का सहारा लिया।