दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 : दण्ड न्यायालय का वर्गीकरण - 02

क्रमशः .. 

  • धारा 9 में उपबन्धित प्रावधानों के अनुसार प्रत्येक सेशन-खंड के लिए एक सेशन न्यायालय की स्थापना करने का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया, लेकिन ऐसे प्रत्य्तेक न्यायालय के लिए न्यायाधीश की नियुक्ति करने का अधिकार उच्च न्यायालय को प्रदत्त किया गया है।
  • सत्र न्यायालय (कोर्ट ऑफ़ सेशन) हर सेशन डिवीज़न के लिए एक सेशन कोर्ट या सत्र न्यायलय स्थापित होता है। धारा 9 (1), (2) के मुताबिक यह नियुक्ति उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है। जरुरत पड़ने पर उच्च न्यायालय एडिशनल सेशन जज एवं असिस्टेंट एडिशनल जज की नियुक्ति कर सकता है। अब यह सभी न्यायाधीश कोर्ट सेशन के रूप में निर्णय सुनायेंगे। यहाँ यह ध्यान रखने वाली बात है कि एडिशनल सेशन जज एवं असिस्टेंट सेशन जज, कोर्ट ऑफ़ सेशन के रूप में कार्य करते हैं लेकिन वे स्वयं कोर्ट ऑफ़ सेशन के स्वतन्त्र इकाई नहीं हैं। वहीँ असिस्टेंट सेशन जज, उस सेशन जज के अधीन होते हैं जिनकी अधिकारिता में वे कार्य करते हैं।
  • धारा 10 का शीर्षक है – ‘सहायक सेशन न्यायाधीशों’ का अधीनस्थ होना। इस धारा के उपबंधों का मूल उद्देश्य सहायक सेशन न्यायाधीश के अधीनस्थ बनाना है जिसके न्यायालय के अधिकारिता में वे कार्य कर रहे हैं।

नोट - धारा 6 में में भले ही सुप्रीम कोर्ट की बात नहीं की गयी है पर उसकी व्यवस्था हमारे संविधान में दी गयी है। इसके अलावा दंड प्रक्रिया संहिता में भी तमाम प्रावधानों में सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्रों की बात की गयी है। तो यह समझा जाना चाहिए कि अदालतों की इस व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट का भी एक अहम् स्थान है। इसके अलावा संहिता और संविधान में उच्च न्यायालय से जुड़े प्रावधनों को विस्तार से समझाया गया है। धारा 6 में कार्यकारी मजिस्ट्रेट को अन्य अदालतों की श्रेणी से अलग रखा गया है, ऐसा संविधान के अनुच्छेद 50 को ध्यान में रखते हुए किया गया है जिसमे कहा गया है:- अनुच्छेद 50: कार्यपालिका से न्यायपालिका का अलग होना, (राज्य न्यायपालिका को राज्य की सार्वजनिक सेवाओं में कार्यपालिका से अलग करने के लिए कदम उठाएगा।) यह जानना महत्वपूर्ण है कि जहाँ अन्य सभी श्रेणी के न्यायालय उच्च न्यायालय के अधीन होते हैं, वहीँ कार्यकारी मजिस्ट्रेट राज्य सरकार के अधीन होते हैं

आगे और भी है ..

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