ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति ने उसकी अर्थव्यवस्था तथा भारत के साथ उसके आर्थिक संबंधों को पूरी तरह बदल कर रख दिया। 18 वीं सदी के उत्तरार्ध तथा 18 वीं सदी के पहले कुछ दशकों में ब्रिटेन में महत्वपूर्ण सामाजिक आर्थिक रूपांतरण हुए।आधुनिक मशीनों, कारखाना प्रणाली तथा पूंजीवाद के आधार पर ब्रिटिश उद्योगों का तेजी से विकास और प्रसार हुआ। इस विकास को अनेक कारणों से बल मिला।
इसके पहले की सदियों से ब्रिटेन का विदेशी व्यापार तेजी से फैलता आया था। युद्ध और उपनिवेशवाद के द्वारा ब्रिटेन में अनेक विदेशी बाजारों पर एकाधिकार कायम कर लिया था। इन निर्यात बाजारों के कारण ब्रिटेन के निर्यातक उद्योगों का उत्पादन तेजी से बढ़ा। जिसमें उत्पादन तथा संगठन की आधुनिकतम तकनीकों का उपयोग किया गया। अफ्रीका, वेस्टइंडीज, लातिनी, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, चीन और सबसे बढ़कर भारत में निर्यात के लिए असीम अवसर प्रदान किए। यह बात सूती वस्त्र उद्योग के लिए खास तौर पर सही थी जो ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति का प्रमुख वाहक बन गया।
ब्रिटेन ने अब तक व्यापार की एक औपनिवेशक प्रणाली स्थापित कर ली थी। जिससे औद्योगिक क्रांति को बल मिला और औद्योगिक क्रांति को और भी मजबूत बनाया। उपनिवेश तथा अल्प विकसित देश ब्रिटेन को अपने खेतों और खदानों के कच्चे माल का निर्यात करते और ब्रिटेन उन्हें अपने कारखानों का तैयार माल बेचता।