साधारण भाषा में समझे तो- जब ठंडी और गर्म वायु राशियां किसी स्थान पर संपर्क में आती है। तो ठंडी वायु गर्म वायु के अपेक्षा वजन होने के कारण नीचे बैठ जाती है, जबकि गर्म वायु ऊपर उठ जाती है। इस संपर्क क्षेत्र को वाताग्र कहते हैं।
वाताग्र दो विभिन्न तापांतर वाली वाली राशियों के मिलने के स्थान पर कुछ क्षण के लिए, जो असांतत्य पृष्ठ की उत्पत्ति होती है उसे वाताग्र की संज्ञा दी जाती है। यह पृष्ठ ढलुआं होता है।
अतः इस प्रकार के दो परस्पर विरोधी वायु राशियों के मध्य निर्मित ढलुआं सीमा सतह को वाताग्र कहते हैं।
जहां कभी भी दो भिन्न वायुराशियों का अभिसरण होता है वहां उनके बीच एक विस्तृत संक्रमणीय प्रदेश स्थापित हो जाता है, इस संक्रमणीय प्रदेश को ही वाताग्र प्रदेश या वाताग्र उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।
वाताग्र पर विद्वानों के मत प्रचलित हैं-
पीटरसन के अनुसार-
वाताग्री सतह वा धारातली सतह को अलग करने वाली रेखा को वाताग्र कहते हैं तथा जिस प्रक्रिया द्वारा वाताग्र की उत्पत्ति होती है उसे वाताग्र उत्पत्ति कहा जाता है।
ट्रिवार्थ के अनुसार-
वाताग्र कोई रेखा नहीं होती अपितु वह पर्याप्त चौड़ाई वाले क्षेत्र होते हैं जो 3 - 50 मील तक चौड़े होते हैं। इसके साथ ही ये क्षेत्र जहां दो भिन्न स्वाभाव वाली वायुराशियां आमने- सामने आकर अभिसरण करती हैं तो उस अभिसरण क्षेत्र को वाताग्र क्षेत्र कहा जाता है।
वाताग्र न तो धरातल के ऊपर लंबवत रूप में होता है और न ही धरातलीय सतह के समांतर है इसके विपरीत वह कुछ कोण पर झुका हुआ होता है।
वाताग्र का ढाल पृथ्वी की घूर्णन गति पर निर्भर करता है, जो ध्रुवों की ओर बदल जाता है।
वाताग्र अपनी उत्पत्ति के फलस्वरूप कुछ विभिन्न अवस्थाओं में नष्ट हो जाते हैं वाताग्रों के इस प्रकार से गायब होने की प्रक्रिया को वाताग्र-क्षय कहते हैं।
किसी स्थान विशेष की जलवायु तथा मौसम को समझने के लिए वाताग्र का अध्ययन करना अति महत्वपूर्ण हो गया है। क्योंकि ये मौसम संबंधी विभिन्न अवस्थाओं को जन्म देते हैं जिन्हें चक्रवातीय या प्रतिचक्रवातीय अवस्थाएं कहा जाता है।