भारत में अंग्रेजों की आर्थिक नीति (भाग-5)

        औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन का अधिकाधिक नगरीकरण होता गया। आधिकाधिक लोग कारखाने वाले नगरों में बसने लगे। 1750 में ब्रिटेन में 50,000 से अधिक जनसंख्या वाले केवल दो नगर थे जबकि 1851 में इनकी संख्या 29 हो चुकी थी।

          समाज में एकदम नए दो वर्गों का उदय हुआ। एक वर्ग औद्योगिक पूंजीपतियों का था जो कारखानों के मालिक थे और दूसरा वर्ग मजदूरों का था जो दैनिक मजदूरी पर अपनी श्रम शक्ति बेचते थे। पहले वर्ग का तेजी से विकास हुआ और वह अभूतपूर्व समृद्धि का उपभोग करने लगा है जबकि श्रम करने वाले गरीब मजदूरों को आरंभ से आंसू के घूंट पीने पड़े। वह अपने ग्रामीण वातावरण से उजाड़ दिए गए और उनकी परंपरागत जीवन पद्धति छिन्न भिन्न और नष्ट कर दी गई।

         अब उन्हें नगरों में रहना पड़ता था जो धूल धक्कड़ और धुुंए से भरे थे। उनके घरों में स्थान बहुत ही कम होता था और वह गंदगी से भरे होते थे। उनमें से अधिकांश को अंधेरे, धूप से वंचित, गंदी बस्तियों में रहना पड़ता था। इन सब का मार्मिक वर्णन चार्ल्स डिकेंस ने अपने उपन्यासों में किया है। कारखानों और खदानों में काम के घंटे आसहनीय सीमा तक लंबे होते थे। कभी-कभी प्रतिदिन 14 से 16 घंटे तक काम करना पड़ता था। कभी-कभी चार-पांच वर्ष के बच्चों को भी कारखानों और खदानों में लगा दिया जाता था। एक मजदूर का जीवन आमतौर पर करीबी, कड़ी मेहनत, बीमारियों और कुपोषण का जीवन होता था। केवल उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ही उनकी आमदनी में थोड़ी बहुत वृद्धि हो सकी थी।

Posted on by