नए-नए क्षेत्र और राजनीतिक सत्ता स्थापित करने की अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की जो महत्वाकांक्षा 17वीं सदी के अंत में औरंगजेब की वजह से धूमिल करने लगी थी। वह 1740 के दशक में दोबारा उभरी, जब मुगल साम्राज्य का पतन कुछ कुछ स्पष्ट होने लगा। नादिरशाह के हमले के बाद केंद्रीय सत्ता का पतन खुलकर सामने आ गया था। लेकिन अब पश्चिमी भारत में विदेशी घुसपैठ की बहुत गुंजाइश ना थी क्योंकि वहां जोशीले मराठों का प्रभुत्व था।
पूर्वी भारत में अली वर्दी खा ने कड़ा नियंत्रण कायम कर रखा था। लेकिन दक्षिण भारत में परिस्थितियां विदेशी दुस्साहसकारियों के लिए धीरे धीरे अनुकूल होती जा रही थी। वहां औरंगजेब की मृत्यु के बाद केंद्रीय सत्ता नहीं रह गई थी और 1748 में निजाम उल मुल्क आसफजहां की मौत के बाद उसका मजबूत शासन भी नहीं रह गया था। इसके अलावा चौथ वसूलने के लिए मराठा सरदार हैदराबाद और दक्षिण के दूसरे भागों पर लगातार हमले करते रहते थे। इन हमलों के कारण राजनीतिक परिस्थितियों अनिश्चित हो गई थी और अब प्रशासन नष्ट हो गया था। कर्नाटक में गद्दी के लिए भाई भाई से लड़ रहा था।
इन परिस्थितियों में विदेशियों को अपना राजनीतिक प्रभाव फैलाने और दक्षिण भारत के राज्यों के मामलों पर नियंत्रण स्थापित करने में सहायता मिली। लेकिन व्यापारिक और राजनीतिक दावे सामने रखने में अंग्रेज अकेले न थे। 17वी सदी के अंत तक अपने पुर्तगाली और डच प्रतिद्वंद्वियों को तो को नष्ट कर चुके थे, पर फ्रांस एक नया प्रतिनिधि बनकर खड़ा हो गया था। 1744 से 1763, अर्थात लगभग 20 वर्षों तक भारतीय व्यापार, संपत्ति और क्षेत्र पर अधिकार के लिए फ्रांसीसीयो और अंग्रेजो में भयानक युद्ध होते रहे।