पर्यावरण अनेक तत्वों का समूह होता है। यह सदैव क्रम बद्ध तंत्र के रूप में अवचालित होता है। पर्यावरण के यह सभी तत्व पृथक रूप में एक दूसरे पर निर्भर है और सामूहिक रूप में क्षेत्रीय पारिस्थितिकी तंत्र को नियंत्रित करते हैं। जब तक इन सभी तत्वों का स्वरूप समानुपातिक रहता है तो पर्यावरण संतुलित रहता है किंतु जैसे ही किसी एक तत्व में अचानक कमी आने लगती है तो पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न होने लगता है, जिसे पर्यावरण निम्नीकरण कहते हैं। यदि पर्यावरण का संतुलन सामाजिक और सीमित होता है तो प्रकृति होता है इसे संतुलित कर लेती है किंतु यदि पर्यावरण कारकों में सामान्य से अधिक गिरावट आती है तो उससे संपूर्ण पर्यावरण का प्रभाव ही बदल जाता है अर्थात पर्यावरण संतुलित हो जाता है। पर्यावरण में निम्नीकरण कई कारणों से होता है। इसे मूलतः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। मानवीय कारण तथा प्राकृतिक कारण। आदि काल से ही मानव पर्यावरण का संबंध रहा है। आदिम अवस्था में उसका पर्यावरण के साथ पूर्ण तादात्म्य में था। किंतु जैसे- जैसे पशु चारण, कृषि, परिवहन, उद्योगों का विकास प्रारंभ हुआ तथा जनसंख्या में वृद्धि हुई, शहरीकरण का विकास हुआ, मानवीय आवश्यकताओं में वृद्धि हुई। इसी के साथ मनुष्य ने पर्यावरण का अधिक से अधिक दोहन शुरू कर दिया। फल स्वरूप पर्यावरण जो कि जीवन का स्रोत और उसका पोषक है, उसी में निम्नीकरण होने लगा और आज यह असहनीय स्थिति में जा पहुंचा है।