योजना आयोग बनाम वित्त आयोग

भारत एक संघीय शासन प्रणाली वाला देश है। जहां संघ एवं राज्य के स्थान पर अलग-अलग सरकारे कार्यरत हैं। संघ सरकार द्वारा राज्यों को वित्तीय अनुदान एवं सहायता प्रदान करने के लिए वित्त आयोग का गठन किया गया। यह आयोग जहां एक और राज्यों की वित्तीय जरूरतों को पूरा कर वित्तीय संतुलन को प्राप्त करने का प्रयास करता है। वहीं दूसरी ओर राज्यों के मध्य क्षेत्रीय असमानता को कम करने का प्रयास करता है। वित्त आयोग एवं योजना आयोग के कार्यों का स्वरूप लगभग एक समान है कि केंद्र से राज्यों को मिलने वाली अनुदान के संदर्भ में सिफारिश करना। इसके अतिरिक्त दोनों के कार्यों की प्रकृति सलाहकारी है। फिर क्या कारण है कि योजना आयोग जैसी राजनीतिक संस्था ने वित्त आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के महत्व को घटा दिया।

योजना आयोग के अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री कार्यरत होता है ,जबकि वित्त आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा तथा राष्ट्रपति उसी अमुक व्यक्ति को अध्यक्ष एवं सदस्य नियुक्त करता है। जिसके लिए सिफारिश प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। ऐसी स्थिति में योजना आयोग की सिफारिश को अधिक महत्व दिया जाना स्वाभाविक है।

एक संस्थान के रूप में जितनी परिपक्वता एवं विशेषता योजना आयोग की दिखाई देती है उतनी विशेषज्ञता वित्त आयोग की नहीं। योजना आयोग के अंतर्गत तकनीकी विशेषज्ञों के साथ साथ प्रशासन पहलू पर सहयोग हेतु योजना भवन कार्यरत है।

योजना आयोग स्थाई संगठन था क्योंकि उसके द्वारा प्रस्तुत किए गए परामर्श की क्रियान्वयन की समीक्षा करना संभव था। जबकि वित्त आयोग अस्थाई  संगठन है। जैसे ही वह अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है। वित्त आयोग के द्वारा नियमित समीक्षा किया जाना संभव नहीं है।

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