औद्योगिक क्रांति में मजदूरी दर का आधार प्रति घंटा था अर्थात वस्तु का उत्पादन हो या ना हो निश्चित न्यूनतम घंटे का कार्य समाप्त होने के बाद श्रमिकों को मजदूरी दी जाती थी। इस कारण श्रमिकों में एक आम धारणा बन गई कि कार्य में कमी आ जाएगी, जिससे उन्हें कार्य से हटाया जा सकता है। इस कारण श्रमिकों में कार्य के प्रति उदासीनता देखी गई। वहीं दूसरी ओर श्रमिकों में उत्पादकता एवं संतुष्ट के संदर्भ में ओवरटाइम ड्यूटी जैसे शब्दों का अभाव था। इन सीमाओं को दूर करने के लिए टेलर के द्वारा विभेदीकरण मजदूरी दर प्रणाली का प्रतिपादन किया गया।
टेलर ने कहा कि औसत माप से अधिक उत्पादन करने वाले श्रमिकों को उन श्रमिकों की तुलना में अधिक मजदूरी दी जाएगी, जिनका उत्पादन औसत माप है या उससे कम। आज इसका उपयोग भारत में निजी प्रशासन के संदर्भ में देखा जा सकता है। जो कि निश्चित न्यूनतम स्तर से अधिक काम करने वाले कर्मचारियों को वेतन के साथ साथ बोनस भी दिया जाता है, अर्थात अभिप्रेरणा के कारक के रूप में आर्थिक कार्य को को महत्व दिया गया, अर्थात इसके माध्यम से टेलर ने श्रमिकों को आर्थिक मनुष्य या उत्पादक मनुष्य की संज्ञा प्रदान की। क्योंकि उनका मानना था कि अधिक से अधिक मजदूरी प्राप्त करने के लिए श्रमिकों से अधिक से अधिक उत्पादन करवाया जा सकता है।