वर्तमान में कृषि में अधिक लागत सिंचाई की अधिक आवश्यकता रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का अधिक प्रयोग तथा मशीनों एवं कृषि यंत्रों का उपयोग बढ़ता जा रहा है रासायनिक खादो एवं कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से खाद्यान्न विषाक्त होते जा रहे हैं जो पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। ऐसी स्थिति में कृषि समस्याओं का समाधान मोटे अनाजों की खेती पर जाकर रुकता है क्योंकि मोटे अनाजों में न केवल पोषक तत्वों का भंडार है बल्कि ये जलवायु लचीलापन वाली फसलें भी है अतः इनकी खेती से ना केवल पोषक खाद्यान्नों की प्राप्ति होगी, बल्कि यह भारतीय किसानों की आय के स्रोत भी बनेंगे।
- मोटे अनाजों की खेती लागत दक्ष होती है। इसमें सूखा सहन करने की क्षमता, फसल पकाने की कम अवधि, उर्वरकों की न्यूनतम मांग तथा कीटों से लड़ने की पर्याप्त रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है ।
- मोटे अनाजों की बाजार कीमत भी गेहूं चावल की तुलना में कहीं अधिक है। इसमें किसानों को लाभ मिलने की संभावना भी अधिक है।
- मोटे अनाजों मैं पोषण का उच्च स्तर विद्यमान होता है । प्रोटीन, वसा, खनिज तत्व, फाईबर, कार्बोहाइड्रेट कैल्शियम, फास्फोरस आयरन आदि के पोषको के मामले में यह किसी भी तरह कम नहीं है ।
सरकार पोषण सुरक्षा हासिल करने के लिए मिशन स्तर पर रागी और ज्वार जैसे मोटे अनाजों की खेती को प्रोत्साहित कर रही है । बाजरा जिसे की पोषक अनाज कहा जाता है , को समर्थन मूल्य पर खरीदा जा रहा है और इसे मध्य भोजन योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत शामिल भी किया जा रहा है इस तरह कहना आयोजित नहीं होगा कि मोटे अनाजों की खेती किसानों के लिए लाभदायक है