हाल ही में कुछ अध्ययनों के अनुसार भगवान को खुश करने के लिए बालिकाओं को मंदिर में छोड़ देने की प्रथा को देवदासी प्रथा कहा जाता है यह प्रथा कर्नाटक के साथ पास के राज्य गोवा में भी एक प्रथा बन गई है । वर्ष 1982 में कानून बनाकर कर्नाटक देवदासी प्रथा को रोकने के लिए कर्नाटक देवदासी अधिनियम पारित किया गया था लेकिन 36 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस कानून को लागू करने के कोई नियम नहीं बने हैं ।
क्या है देवदासी प्रथा ?-
देवदासी प्रथा एक धार्मिक प्रथा है जिसमें अभिभावक अपनी बेटी का किसी मंदिर अथवा किसी देवता से विवाह कर देते हैं या विवाह बच्चियों के वयस्क होने के पहले हो जाता है।
वर्तमान समय में इस प्रथा का दुरुपयोग बालिकाओं को वेश्यावृत्ति में धकेलने के लिए हो रहा है भारत में कई राज्यों ने इस प्रथा के उन्मूलन के लिए कानून बनाए हैं परंतु दक्षिण के कुछ राज्यों में यह प्रथा अभी भी चल रही है जिससे मासूम बच्चियों का मानसिक व शारीरिक शोषण निरंतर चल रहा है ।
महत्वपूर्ण बिंदु -
- अध्ययनों के अनुसार यह पाया गया है कि जो बच्चियां शारीरिक व मानसिक रूप से अस्वस्थ होती हैं उनको देवदासी बनाने की संभावना अधिक हो जाती है क्योंकि वह ना तो मानसिक रूप से और ना ही शारीरिक रूप से इसका विरोध करती हैं जिससे इस प्रथा को बढ़ावा मिल जाता है। सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समुदायों की लड़कियां इस प्रथा की शिकार होती हैं
- कानून के अनुसार देवदासी प्रथा चाहे जिस रूप में हो यह आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम , 2013 के अनुभाग 370 और 370(a) के विरुद्ध है।
- देवदासी प्रथा अनैतिक आवागमन अधिनियम का उल्लंघन करती है तथा यह भारतीय दंड संहिता के अनुभाग- 372 के अधीन भी एक अपराध है ।