जल चक्र की संक्षिप्त जानकारी.......

पृथ्वी के विभिन्न भागों में जल की प्रवाहन क्रिया एवं वायुमंडल से धरातल पर जल का गिरना जलीयचक्र कहलाता है।

या फिर विद्वानों ने इसकी और ही तार्किक  परिभाषा पेश की है जैसे मॉक हाउस अनुसार समुद्र वायु तथा स्थल के बीच जल के कभी न समाप्त होने वाले विनिमय को जल चक्र की संज्ञा दी जाती है।

जल चक्र में जल की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को भी सम्मिलित किया गया है।
जो सामान्यतः द्रवीय, वाष्प तथा ठोस अवस्था में बदलते रहते हैं।


सरलता से देखा जाए तो वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प के संघनन होने के कारण वर्षा होती है, जिससे वाष्प वायुमंडल से धरती पर जल के रूप में गिरता है। अब जल का कुछ भाग पेड़ पौधों को भिगोते हुए धरातल पर बहता हुआ। नालों, झीलों तथा नदियों के माध्यम से महासागरों में समाहित हो जाता है।

कुछ भाग भूमि द्वारा सोख लिया जाता है जिससे भूमिगत जल कहते हैं। और कुछ अंश पेड़ - पौधों एवं जीव - जंतुओं की जैविक क्रिया में प्रयोग कर लिया जाता है। जबकि जल  बहुत बड़ी मात्रा में  हिम के रूप में पर्वत चोटियों पर व  ऊंची-ऊंची पहाड़ियों पर जमा हुआ है।


अतः जलचक्र की यह अवधारणा है, कि पृथ्वी की ऊपरी सतह पर उपस्थित जल वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में तथा पुनः वहां से संघनित होकर धरातल पर गिरता है। इसके साथ - साथ हिमानियों से बर्फ का पिघलना भी इसके अंतर्गत आता है।


जल चक्र में जल को प्रतिशत दृष्टिकोण से देखें तो जल का 97% भाग महासागरों में तथा 3% महाद्वीपों पर है। 
महाद्वीपों में कुल जल का 75% हिस्सा हिम (बर्फ) की चादरों के रूप में, 24% भू जल के रूप में है। शेष 1% का 38% मृदा में, 22% वायु में, 20% नदियों में तथा 20% झीलों में पाया जाता है।

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