भारतीय दण्ड संहिता : भारत के भीतर किए गए अपराधों का दण्ड - 02

क्रमशः ...

  • धारा 3 में यह कहीं भी उल्लेख नहीं है  कि किसी व्यक्ति को इस संहिता के प्रभाव से मुक्त रखा जाए। केवल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 361 के अन्तर्गत भारत के राष्ट्रपति तथा राज्यों के राज्यपालों को इस संहिता के प्रभाव से मुक्त रखा गया है। अतः इन व्यक्तियों को दण्ड संहिता के अधीन दण्डित नहीं किया जा सकेगा।
  • अन्तर्राष्ट्रीय विधि द्वारा सुस्थापित नियम के अनुसार किसी विदेशी शासक को भी इस संहिता के अन्तर्गत दण्डित नहीं किया जा सकेगा। इस उन्मुक्ति का मूल आधार राष्ट्रों के बीच परस्पर सद्भावना और सहयोग की भावना है। (रझीतुल्ला बनाम निजाम ऑफ हैदराबाद, A.I.R.1958 S.C. 379)इसी प्रकार विदेशी राजदूत एवं राजनयिक अभिकर्ताओं (विदेशी प्रतिनिधि) तथा उनके परिवारजनों एवं सेवकों को भी इस संहिता से उन्मुक्ति प्राप्त है। यदि इनमें से कोई भारत में अपराध करता है, तो उन्हें उनके संप्रभु राज्य अथवा शासक के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाता है।
  • किसी भी विदेशी शत्रु के विरुध्द भी इस संहित के अधीन अपराध के लिए अभियोजन नहीं चलाया जा सकता है क्योंकि उनका विचारण सैन्य न्यायालय द्वारा किया जाता है। परन्तु यदि कोई व्यक्ति सैन्य कार्यों के अलावा कोई अपराध करता है, तो उसे संहिता के अनुसार दण्डित किया जा सकता है।
  • यद्यपि किसी विधिक व्यक्ति अर्थात कम्पनी या निगम को इस संहिता के अधीन कारावासित नहीं किया जा सकता है लेकिन उसके प्रतिनिधि को व्यक्तिगत दायित्व के आधार पर दण्डित किया जा सकाता है। निगमित निकाय को संहिता के अधीन केवल जुर्माने से दण्डित किया जा सकता है।
  • इस संहिता के प्रभाव से युध्द-बंदियों को मुक्त रखा गया है।
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