जैव - विविधता, मृदा निर्माण, मृदा अपरदन की रोकथाम, अपशिष्ट का पुनर्चक्रण, शस्य परागण यह सभी मानव अस्तित्व का आधार बनी हुई है ,आइए इसके संबंध में जानकारी लेते हैं ।

किसी प्राकृतिक प्रदेश में पाए जाने वाले जंगली तथा पालन जीव - जन्तुओं एवं पादपों की प्रजातियों की बहुलता को जैव - विविधता ( Bio diversity ) कहते हैं । पर्यावरणीय हास के कारण विगत वर्षों में ही इस संकल्पना का विकास हुआ है । जैव - विविधता के प्रमुख पक्ष विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तन्त्र जिनमें विविध पादप तथा जीव - जन्तु समुदाय ( Community ) सम्मिलित हैं , अपने आवृत्त परिवेश से आवद्ध हैं । जैव विविधता के ये घटक पारिस्थितिकी तन्त्र को बनाए रखने में भी सहायक हैं । मानव अस्तित्व के लिए प्राकृतिक संसाधनों ( Natural Resources ) की उपलब्धता में इन्हीं जैविक घटकों की भूमिका होती है । जैसे मृदा निर्माण , मृदा अपरदन की रोकथाम में वनस्पति जाति की मुख्य भूमिका रहती है । पौधे एवं जानवर मृदा निर्माण को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं । मृदा के लिए  प्रभावकारी पौधों की जीवन प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण होती है , जिनमें विशेष रूप से मृदा से सटे हुए छोटे पौधे एवं जानवर सम्मिलित है । वानस्पतिक आवरण मृदा अपरदन ( Soil Erosion ) की दर को प्रभावित करता है तथा मृदा को सुरक्षात्मक आवरण प्रदान करता है । इसी प्रकार अपशिष्ट का पुनःचक्रण व सस्य परागण भी जीव - पादप द्वारा सुनियोजित होते हैं । अतः मानव की  आवश्यकता प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जैवविविधता के इन माध्यमों  पर निर्भर है । 

Posted on by