मुगलकालीन प्रशासन तथा राजस्व सिद्धांत

मुगलों का राजत्व सिद्धांत तुर्की और मंगोल परंपरा पर आधारित अर्थात शरीयत (कुरान एवं हदीस का सम्मिलित) नाम पर आधारित था ।
     जिस प्रकार मंगोल खलीफा की सत्ता को नहीं मानते थे उसी प्रकार मुगल भी खलीफा की सत्ता को अस्वीकार कर स्वयं को बादशाह और खलीफा घोषित किया । मंगोलो के राजत्व में राज्य का विभाजन पुत्रों के बीच, जिसे बाबर द्वारा अस्वीकार किया गया ।
     बाबर और हुमायूं तुर्की चगताई कानून संघिता तुरा का सम्मान करते थे । जिसके तहत एक साथ दो शासकों को अस्वीकार किया गया ।
     
 तुर्की मंगोल परंपरा में शक्तिशाली राजतंत्र की अवधारणा
 सुल्तान एवं बादशाह में अंतर
 सुल्तान वो जो अपने ऊपर खलीफा की सत्ता को स्वीकारते थे, जबकि बादशाह स्वयं को ही खलीफा मानते थे । बाबर ने 1508 में (हुमायूं के जन्म के समय) स्वयं को बादशाह घोषित कर खलीफा के नाम मात्र उपाधि से मुक्त कर लिया । बाबर राजत्व संबंधी विचारधारा प्रकट करते हुए कहा कि "बादशाही से बढ़कर कोई बंधन नहीं । बादशाह के लिए आलसी और एकांत वादी जीवन उचित नहीं" ।

         हुमायूं ने बादशाह को पृथ्वी पर खुदा का प्रतिनिधि कहा । हुमायूं के अनुसार बादशाह अपनी प्रजा की रक्षा वैसे करता है जैसे ईश्वर ।
         अकबर का राजत्व सिद्धांत सुलह-ए-कुल पर आधारित था । जिसकी व्याख्या अबुल फजल द्वारा आईने रहनुमानी में की गई जो आईन-ए अकबरी का 77 वां अध्याय था । अबुल फजल के अनुसार ईश्वर की नजरों में राजत्व से बढ़कर दूसरा कोई चीज नहीं, अर्थात राजत्व ईश्वर का अनुग्रह है । यह उसी व्यक्ति को प्राप्त होता है, जिस व्यक्ति में हजारों गुण एक साथ समाप्त हो । अबुल फजल कहता है, कि "राजत्व का सूर्य की सूर्य प्रकाश से जोर राजा को सीधे ईश्वर से प्राप्त होता है" ।

विशेष :-
अकबर के काल में राजत्व का ही भारतीयकरण हुआ । अकबर ने अपने सम्मुख चक्रवर्ती सम्राट की अवधारणा रखा, जो भारतीय विशेषता थी । अकबर ने राजतंत्र को धर्म एवं संप्रदाय से ऊपर माना एवं रूढ़िवादी इस्लामी सिद्धांत के आधार पर सुलह ए कुल की नीति अपनाई ,जबकि औरंगजेब ने राजतंत्र को इस्लाम का अनुचर बना दिया ।

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