मुगल प्रशासन सैन्य शक्ति पर आधारित एक केंद्रीकृत व्यवस्था थी, जो नियंत्रण एवं संतुलन पर आधारित थी इसमें भारतीय तत्वों का सम्मिश्रण था अर्थात यह भारतीय पृष्ठभूमि में अरबी, फारसी पद्धति थी । इस प्रशासन में अधिकारों का बंटवारा सूबेदार और दीवान के बीच मिस्र के शासकों द्वारा अपनाई गई राजत्व प्रणाली की दो पद्धतियां - अति प्राचीन हिंदू तथा अन्य सिद्धांतों पर था जबकि मनसबदारी व्यवस्था मध्य दक्षिण एशिया में ग्रहण की गई थी । क्योंकि मुगल साम्राज्य पूर्णतया केंद्रीकृत था । इसलिए बादशाह की शक्ति असीमित होती थी , फिर भी प्रशासन की गतिविधियों को चलाने के लिए एक मंत्री परिषद होती थी, जिसके लिए विजारक शब्द का प्रयोग होता था ।
वकील /वजीर
बाबर और हुमायूं के समय वजीर का पद बहुत महत्वपूर्ण था । इसे सैनिक तथा असैनिक दोनों मामलों में असीमित अधिकार प्राप्त था । अकबर के काल में इसे वकील कहा जाने लगा । अकबर के काल में आरंभिक वर्षों में इस पद पर बैरम खां था, जिसके द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया गया । अतः अकबर ने इस पद की महत्वता को कम करने के लिए एक नए पद दीवान- ए -विजारत ए- कुल के पद की स्थापना की । जिसे राजत्व एवं वित्तीय मामलों तथा प्रबंधन का अधिकार दिया गया और धीरे-धीरे अकबर ने वकील के एकाधिकार को समाप्त कर इसके अधिकार को दीवान मीर बख्शी मीर- ए- समा तथा सद्र- उस्स- सद्र में बांट दिया । अर्थात अब वकील का पद केवल नाम व सम्मान कर रहा, जो शाहजहां के समय तक चलता रहा । इस प्रकार अकबर के काल में केवल चार ही मंत्रिपरिषद था ।
1.दीवान
2.मीर बक्शी
3.मीर-ए- सामा
4.सद्र- उस्स- सद्र