गाँधी-इरविन समझौता

*सविनय अवज्ञा आंदोलन ब्रिटिश सरकार का तख्ता हिल गया। उसने इस आंदोलन को कुचलने के लिए प्रत्येक प्रकार के दमन का उपयोग किया। सहस्त्र स्वयंसेवकों को जेल में डाल दिया गया। इसके बाद लॉर्ड इरविन ने कूटनीति से महात्मा गांधी को एक समझौते के लिए तैयार कर लिया। महात्मा गांधी ने एक बार फिर आंदोलन वापस ले लिया। 5 मार्च 1931 को उन्होंने इरविन के साथ एक समझौता किया । इस गांधी इरविन समझौते के जरिए गांधीज ने लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी। सबसे पहले गोल में सम्मेलन का कांग्रेस ने बहिष्कार किया था इसके बदले सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राजी हो गई । दिसंबर 1931 ईसवी में सम्मेलन के लिए गांधीजी लंदन गए । यह वार्ता बीच में ही टूट गई और निराश वापस लौटना पड़ा यहां आकर उन्होंने देखा कि सरकार ने नए सिरे से दमन कार्य शुरू कर दिया है । गफ्फार खान और जवाहरलाल नेहरू दोनों जेल में थे। कांग्रेश को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था। सभाओं प्रदर्शनों और बहिष्कार जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा रहे थे। भारी आशंकाओं के बीच महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू कर दिया। साल भर तक आंदोलन चला लेकिन 1934 ईस्वी तक आते-आते उसकी गति मंद पड़ने लगी थी।
Posted on by