फ्रांस की क्रांति

Ashish Verma:
फ्रांस की क्रांति का कारण वर्षों से चली आ रही दुर्व्यवस्था एवं कुशासन का परिणाम था। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ्रांस में निरंकुश और स्वेच्छाचारी सम्राटों का शासन था। इस समय पर पादरियों सामंतों एवं उच्चाधिकारियों को राज्य की ओर से विशेष अधिकार प्राप्त थे।यह लोग वैभव एवं विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत करते थे लेकिन साधारण वर्ग की दशा अत्यधिक शोचनीय थी उनका जीवन स्तर निम्न कोटि का होता चला जा रहा था।
इसका मुख्य कारण राजाओं की निरंकुशता योग्यता एवं शासन संबंधी विभिन्न अनियमितताएं थी।
इन परिस्थितियों का ज्ञान इस उदाहरण से हो जाता है कि "जब फ्रांस के राजा और रानी की सवारी के पीछे भूखी-नंगी जनता भूख से व्याकुल होकर रोटी दो रोटी दो के नारे लगाते हुए दौड़ रही थी तो परिस्थिति से अनजान रानी ने कहा यदि रोटी नहीं मिलती तो केक क्यों नहीं खाते"।
फ्रांस की बिगड़ी हुई आर्थिक दशा के कारण जनसाधारण का जीवन कष्टों से भरा हुआ था।इसके परिणाम स्वरूप 1789 ईस्वी में फ्रांस में भीषण जन विद्रोह हुआ और यहां की निरंकुश राजतंत्र का अंत हुआ तथा फ्रांस में लोकतंत्र की स्थापना हुई।इस क्रांति में फ्रांस के तत्कालीन राजा लुई सोलहवां एवं उसकी रानी मेरि आंतोआंत को मौत के घाट उतार दिया गया। इस क्रांति के फलस्वरूप संपूर्ण यूरोप युद्ध की ज्वाला में जलता रहा।यह रक्तपात 14 जुलाई 1789 ईस्वी को ब्रास्तील की घटना के साथ प्रारंभ हुआ और 18जून 1815 ईस्वी को वाटर लू के युद्ध के साथ समाप्त हुआ।
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