प्राणियों के शरीर में विभिन्न उपापचयी अभिक्रियाओं के फलस्वरुप जो अपशिष्ट पदार्थ बनते हैं, उनका शरीर के बाहर निकलना अति आवश्यक है।
इस संपूर्ण क्रिया में भाग लेने वाले अंगों को उत्सर्जी अंग तथा इस क्रिया को उत्सर्जन कहा जाता है।
अतः एक लिहाज से देखा जाए तो ठंडी, गर्मी एवं किसी भी मौसम में यह अंग अपनी भूमिका को बखूबी निभाते हैं।
ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
1. वृक्क - मनुष्य एवं अन्य स्तनधारीयों (मैमेलिया वर्ग) प्राणियों में एक जोड़ी वृक्क पाए जाते हैं।
जो अपशिष्ट पदार्थों के उत्सर्जन के लिए अत्यधिक उपयोगी अंग है।
इसका वजन 140 ग्राम होता है, नेफ्रान वृक कार्यामक इकाई है।
अन्य अंगो की अपेक्षा वृक्कों में रुधिर आपूर्ति अधिक होती है।
वृक्कों में प्रति मिनट औसतन 125ml रक्त प्रवाहन होता है।
2. त्वाचा - त्वचा में पाई जाने वाली तैलीय ग्रंथियां (सीबम) एवं श्वेद ग्रंथियां पसीने का स्त्रावण करती है।
3. यकृत - यकृत कोशिका आवश्यकता से अधिक कमीनों अमल तथा रुधिर की अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित करता है, अर्थात मूत्र निर्माण में इसका विशेष योगदान है। इस प्रकार यकृत में ही यूरीन का निर्माण होता है।
4. फेफड़ा - वसा और कार्बोहाइड्रेट के विघटन के फलस्वरुप कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनता है। जिसका उत्सर्जन फेफड़े के श्वासोच्छवास द्वारा होता है।
स्वस्थ्य रहने में इन उत्सर्जी अंगों का अद्भुत योगदान-
अगर हमारी बॉडी से यह अपशिष्ट पदार्थ निष्काषित ना हों तो हमें तरह तरह की बीमारियों को सहन करना पड़ सकता है।
और इनकी एक सीमा भी निर्धारित है जैसे कि मूत्र की- एक स्वस्थ्य व्यक्ति के लिए 24 घंटे में 1.5 लीटर यूरीन का निष्कासित करना अनिवार्य होता है।
मूत्र का पी.एच. मान 4.5 से 8.6 होता है, जो सामान्यतः अम्लीय होता है।
लेकिन आज वर्तमान समय (गर्मी में) एक लीटर यूरीन का निष्कासन कर पाना मुश्किल हो रहा है। जिससे स्वस्थ्य रहने का सवाल खड़ा हो रहा है। और स्वास्थ्य को लेकर समस्याएं दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं।