औद्योगिक पूंजीवाद तथा औद्योगिक मजदूर-

 औद्योगिक क्रांति के बाद जो समाज  व्यवस्था बनी उसको औद्योगिक पूंजीवाद कहा जाता है समाज के मुख्य वर्ग के पूंजीपति अर्थात उत्पादन के साधनों के मालिक और मजदूर लेकर काम करते थे पूंजीपतियों में एक छोटे से तबके का ना केवल बड़ी संख्या में उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों पर नियंत्रण हो गया बल्कि प्रत्येक अथवा परोक्ष रूप से  यह लोग समूचे समाज के आर्थिक जीवन को नियंत्रित करने लगे ।

कुछ लोगों के हाथ में आर्थिक ताकत केंद्रित हो जाने के कारण समाज में अत्यधिक असमानता  पैदा हुई हम पूंजीपतियों और बाकी आबादी के बीच गहरी खाई पैदा हुई हाथों की क्रांति नहीं बड़ी संख्या में ऐसे मजदूरों को जन्म दिया जिनके पास ना तो अपनी भूमि थी और ना काम करने के लिए अपने उपकरण।

 यह लोग पूरी तरह मालिक पर निर्भर थे की ओर से जो मजदूरी मिलती थी उनको स्वीकार करनी पड़ती थी इसका कारण था कि रोजगार की तुलना में  मजदूरों की संख्या अधिक थी यहां तक कि कारखानों में स्त्रियों और बच्चों को काम पर लगाया जाता था क्योंकि वह कम मजदूरी पर उपलब्ध थे।

 अक्सर इन लोगों को लगातार 15 से 18 घंटे काम करना पड़ता था और उनके बीच कोई अवकाश नहीं मिलता था यदि कोई मालिक किसी कारण मजदूर से नाखुश हो जाए।

 यदि काम करते समय किसी दुर्घटना में चोट लग जाती तो मालिक उसे किसी प्रकार की सहायता नहीं देता था मजदूरों के पास ऐसे समय निर्वाह के कोई साधन नहीं होते थे।

इस प्रकार औद्योगिक पूंजीवाद तथा और औद्योगिक मजदूर के बीच की स्थिति मिलती थी।

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