यदि मुझसे पूछा जाए कि संविधान में कौन सा विशेष अनुच्छेद सबसे महत्वपूर्ण है ,जिसके बिना यह संविधान शून्य हो जाएगा तो मैं इसके सिवाय( अनुच्छेद 32 ) किसी दूसरे अनुच्छेद का नाम नहीं लूंगा यह संविधान की आत्मा है ।( संवैधानिक उपचारों का अधिकार) ।।

सामान्य परिचय
अधिकारों का अस्तित्व ही विचारों पर आधारित है । उपचारों के अभाव में अधिकारों का अस्तित्व ही संभव नहीं है,  अर्थात असंभव है । भारतीय संविधान में जहां अधिकारों का अत्यधिक उल्लेख किया गया है, वहीं अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उपचारों का समावेश किया गया है । अनुच्छेद 32 संविधान के भाग - 3 में होने के कारण स्वयं एक मूल अधिकार है ।
            अनुच्छेद 32 (1) नागरिकों को संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय को समुचित कार्यवाहियों द्वारा प्रचारित करने के अधिकार की गारंटी करता है । 
            अनुच्छेद 32(2) उच्चतम न्यायालय को इन अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित निर्देश या रिट, जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण के प्रकार के रिट भी सम्मिलित हैं , जारी करने की शक्ति प्रदान करता है । 
            अनुच्छेद 32(3) के अंतर्गत संसद विधि द्वारा किसी न्यायालय को उसकी स्थानीय सीमाओं के भीतर उच्चतम न्यायालय द्वारा खंड 2 के अधीन प्रयोग की जाने वाली किसी या सभी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए सशक्त कर सकती है । खंड 4 यह उपबंधित करता है, कि संविधान द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय इस अनुच्छेद द्वारा गारंटी किए गए अधिकारों को निलंबित नहीं किया जाएगा । 
            अनुच्छेद 32(1) के अधीन उच्चतम न्यायालय के मूल अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति अत्यंत व्यापक है । इस संबंध में उस पर कोई परिसीमा नहीं है कि वह कौन सी प्रक्रिया अपनाए, सिवाय इसके कि उसे प्रयोजन के अनुसार अर्थात मूल अधिकारों के प्रवर्तित करने के लिए समुचित होना चाहिए । न्यायालय परंपरागत प्रतिपक्षी प्रणाली जिसमें (प्रतिवादी का होना आवश्यक होता है) अनुसरण करने के लिए बाध्य नहीं है । संविधान निर्माताओं ने मूल अधिकारों के प्रवर्तित करने के लिए कोई विशेष प्रक्रिया नहीं विहित किया है, क्योंकि वह जानते थे कि भारत जैसे देश के लिए जहां इतने निर्धनता, अज्ञानता, अशिक्षा, अभाव और शोषण है वहां मूल अधिकारों को प्रवर्तित करने के लिए सूत्र या कार्यवाहियों ऊपर जोर देना उपचारों की विफलता ही होगी ।
 
  नोट -  अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता संविधान का "आधारभूत ढांचा" है । अतः इसे अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधन करके नष्ट नहीं किया जा सकता है ।

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