क्रिया के भेद

कर्म की दृष्टि से- सामंत अकरम की दृष्टि से क्रिया दो प्रकार की होती है * यदि द्विकर्मक को सम्मिलित कर लिया जाए तो इनकी संख्या 3 हो जाती है जो इस प्रकार है

1.सकर्मक क्रिया

2. अकर्मक क्रिया

3. द्विकर्मक क्रिया

1. सकर्मक क्रिया-- जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कर्ता, करता है परंतु फल कर्म पर पड़़ता है उसे सकर्मक क्रिया कहते है।

*यथा-- मोहन आम खा रहा है, इस वाक्य में 'खा रहा है' क्रिया के व्यापार का फल आम पर पड़ रहा है इसलिए 'खा रहा है' सकर्मक क्रिया है। इस क्रिया को पहचानने की विधि क्या अथवा कौन प्रश्न करने पर उत्तर की प्राप्ति हो जाती है। उपर्युक्त उदाहरण में प्रश्न करने पर स्वरूप होगा-- मोहन क्या खा रहा है ? इसका उत्तर आम होगा। अतः यह सकर्मक क्रिया है।

2.अकर्मक क्रिया-- जिस क्रिया के व्यापार का संचालन कर्ता द्वारा किया जाता है और फल भी करता पर पड़ता है उसेेेे अकर्मक क्रिया कहते हैं।

जैसे :- सोहन सो रहा है। इसमें सोहन कर्ता है तथा 'सोना' क्रिया अकर्मक है। क्योंकि सोने की क्रिया कर्ता द्वारा पूरी कई जा रही है अतः सोने का फल भी उसी पर पड़ रहा है इसलिए सोना क्रिया अकर्मक है।

नोट-- जिन धातु का प्रयोग अकर्मक और सकर्मक दोनों रूपों में होता है उन्हें उभयविधि धातु कहते हैं।

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