नदी प्रतिरूप के विषय में जानकारी

मुख्य नदी का अपनी सहायिकाओं के साथ मिलकर एक विशिष्ट आकृति को ग्रहण करना  नदी प्रतिरूप कहलाता है। 


नदी प्रतिरूप निम्न प्रकार के होते हैं 

आयताकार प्रतिरूप - जब मुख्य नदी की सहायक आए ग्रेनाइट चट्टानी क्षेत्र में दरारों के सहारे प्रवेश करती हैं और एक दूसरे से लंबवत रूप में मिलती है तो इस प्रकार से निर्मित नदी प्रतिरूप को आयताकार प्रतिरूप कहा जाता है। 

जालीनुमा प्रतिरूप- कटक एवं घाटी नुमा संरचना यदि समांतर है तो दो श्रेणियों के मध्य प्राप्त घाटी में प्रवाहित मुख्य नदी से लंबवत सहायिकाओं के जल विस्तृत करने से इस प्रतिरूप का निर्माण होता है
             उदाहरण - महान हिमालय मध्य हिमालय   

पादप आकार प्रतिरूप - ढाल के अनुरूप प्रवाहित कठोर चट्टानी क्षेत्रों में विकसित जिसमें सभी सहायक आएं उप सहायक आएं न्यून कोण में मिलती हूं इस प्रकार के प्रतिरूप को पादप आकार प्रतिरूप कहा जाता है। 
         जैसे - कावेरी, गोदावरी, कृष्णा 

वलयाकार प्रतिरूप - किसी विस्तृत पठारी क्षेत्र से निकलने वाली नदियां यदि पठार का परिक्रमण करती हुई बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं ऐसा प्रतिरूप रांची पठार में प्राप्त होता है जहां स्वर्णरेखा उत्तर तथा दक्षिण नदियां प्रवाहित होती हैं। 

समांतर प्रतिरूप - मुख्य नदियां एक दूसरे से समांतर प्रवाहित होती हुई सागर में जल विसर्जित करती हूं या किसी मुख्य नदी की सहायक एक दूसरे से समांतर जल विसर्जित करती हों इस प्रकार से बने प्रतिरूप को समांतर प्रतिरूप कहा जाता है। 
      जैसे - पश्चिमी घाट या पश्चिमी तटीय मैदान का प्रतिरूप

पंख नुमा प्रतिरूप - यह प्रतिरूप भ्रंश घाटी में प्रवाहित होने वाली दामोदर महानदी नर्मदा आदि में प्राप्त होता है जिसकी संकीर्ण घाटी में प्रवाहित मुख्य नदी की सहायीका न्यून कोण पर मिलती हैं यदि यह मुख्य नदी से लंबवत संयुक्त होती है तो इसे हैरिंगबोन पेटर्न कहा जाता है। 

Posted on by