आधुनिक भारत का इतिहास -उत्तरवर्ती मुगल, Day -1

                      उत्तरवर्ती मुगल 

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के समय उसके तीन पुत्र थे मुअज्जम, आजम तथा कामबख्श। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके बड़े बेटे मुअज्जम ने लाहौर में 'पुल-ए-शाहदौला' में अपना राज्याभिषेक कराया। अपने भाई के साथ उसे गद्दी के लिए संघर्ष भी करने पड़े। उसने सर्वप्रथम आजम को सामूगढ़ के निकट जाजौ के युध्द में पराजित किया जबकि कामबख्श को हौदराबाद के युध्द में 1709 में पराजित किया। तत्पश्चात बहादुर शाह प्रथम के नाम से मुअज्जम ने गद्दी संभाली।

बहादुर शाह प्रथम ( 1707-12)

इसे 'शाह आलम प्रथम' भी कहा जाता है।

इसी के शासन काल में औरंगजेब के समय से ही कैद में रह रहे शिवाजी के पुत्र शाहू को कैद से छोड़ा गया।

# बहादुर शाह प्रथम के संबंध में इतिहासकारों की राय यह है कि यह वह अंतिम मुगल बादशाह था जिसके बारे में कुछ अच्छी बातें कही जा सकती हैं।

#प्रसिध्द इतिहासकार खफी खाँ ने ( मुंतखाब-उल-लुबाब पुस्तक के रचयिता ) ने बहादुर शाह प्रथम को शाह-ए-बेखबर कहकर पुकारा है।

जहाँदार शाह (1712-13)

# बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उसके चार पुत्रों - जमींदार शाह, अजीम-उस-शान, रफी-उस-शान व जहां शाह  के बीच गद्दी के लिए संघर्ष हुआ जिसमें जहांदार शाह विजयी रहा।

# जहांदार शाह ने भी हिन्दुओं के प्रति मेल-मिलाप की नीति का पालन किया। इसी ने आमेर के शासक जयसिंह को 'मिजा राजा सवाई'  की उपाधि और मालवा की सूबेदारी तथा मीरवाड़ (जोधपुर) के शासक अजीत सिंह को 'महाराजा' की उपाधि और गुजरात की सूबेदारी सौंपी।

# आमेर का शासक जयसिंह एक शक्तिशाली शासक था। उसने आधुनिक खगोल वेधशाला जंतर-मंतर का निर्माण कराया। ये जंतर-मंतर भारत के 5 स्थानों में स्थित हैं - उज्जैन, बनारस, मथुरा, दिल्ली तथा जयपुर ।

# जयसिंह ने तो खगोलिकी से संबंधित एक सारणी भी तैयार करायी थी जिसे 'जिज-मुहम्मद शाही' के नाम से जाना जाता है।

# इसने यूक्लिड के रेखागणित का 'संस्कृत' भाषा में अनुवाद किया।

# जहांदार शाह के काल में लालकुमारी नामक एक वैश्या का प्रशासन में काफी वर्चस्व बड़ गया था।

# जहांदार शाह को 'लम्पट मूर्ख'  भी पुकारा जाता है।

फर्रुखसियर ( 1713-19 )

जहांदार शाह की मृत्यु के बाद अजीम-उस-शान के पुत्र फर्रुखसियर ने सैयद बंधुओं ( हुसैन अली खां बरहा और अब्दुल्ला) के सहयोग से शासक बना।

# सैयद बंधुओं का दिनानुदिन फर्रुखसियर पर प्रभाव बढता गया। फर्रुखसियर के काल में ही जान सुरमन के नेतृत्व में अंग्रेज प्रतिनिधियों का एक दल व्यापारिक रियायतें प्राप्त करने हेतु आया। उस समय फर्रुखसियर एक गम्भीर फोड़े से पीडित था जिसका इलाज प्रतिनिधि दल के एक सर्जन हैमिल्टन ने कर दिया। फर्रुखसियर ने तब खुश होकर 1717 ई० में ईस्ट इन्डिया कम्पनी के नाम एक फरमान जारी किया जिसे प्रसिध्द इतिहासकार आर्म्स ने ईस्ट इन्डिया कम्पनी के इतिहास में मैग्नाकार्टा कहकर पुकारा है।

# इसी प्रकार मराठा छत्रपति का प्रतिनिधि पेशवा बालाजी विश्वनाथ व फर्रुखसियर के प्रतिनिधि हुसैन अली खां के बीच भी 1719 ई० में एक संधि हुई जिसे प्रसिध्द इतिहासकार रिचर्ड टेम्पल ने 'मराठा साम्राज्य के इतिहास में मैग्नाकार्टा कहकर पुकारा है।

फर्रुखसियर के शासन काल में घटी एक महत्वपूर्ण घटना थी, प्रसिध्द सिख नेता बंदा बहादुर की हत्या । उल्लेखनीय है कि बहादुर शाह प्रथम के काल में मुगलों के गुरु गोविन्द सिंह (अन्तिम सिख गुरु) के साथ अच्छे संबंध थे परन्तु गोविन्द सिंह की मृत्यु के बाद संबंध फिर से कटुतापुर्ण हो गये।

# बंदा बहादुर जिसे सच्चा पादशाह भी कहा जाता है, के नेतृत्व में सिखों ने एक बार फिर से मुगलों के विरुध्द विद्रोह कर दिया। बहादुर शाह प्रथम ने बंदा बहादुर के खिलाफ अभियान भी किया किन्तु बंदा बहादुर ने खुद को लौहगढ़ के किले में छिपा लिया था। उल्लेखनीय है कि यह किला हिमालय की तराई में अम्बाला के उत्तरपुर्व में गुरु गोविन्द सिंह ने बनवाया था।

फर्रुखसियर भारतीय इतिहास में घृणित कायर' के नाम से भी जाना जाता है।

मुहम्मद शाह (1719-48 ई० )

#औरंगजेब की मृत्यु के बाद यह प्रथम एसा शासक था जिसका शासन काल अपेक्षाकृत लम्बा रहा।

# मुहम्मद शाह के काल में भी सैयद बंधुओं का प्रभाव बढता रहा।

# मुहम्मद शाह के शासन काल में अनेक राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करनी प्रारंभ कर दी। सर्वप्रथम जिस राज्य ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की वह हैदराबाद का राज्य था जिसकी स्थापना निजाम-उल-मुलक आसफजाह चिनकिलिच खां ने की थी। इसी के साथ ही अन्य राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करनी प्रारंभ कर दी जैसे- 

बंगाल      -      अलीवर्दी खां

अवध       -     सआदत खां बुरहान-उल-मुल्क

कर्नाटक   -    सादुतुल्ला खां

मुहम्मद शाह के काल में कई महत्वपूर्ण घटनायें घटी। अब तक दक्षिण भारत तक ही सीमित रहे मराठाओं ने शक्तिशाली और साम्राज्यवादी पेशवा बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में 1737 में दिल्ली तक पहुंच की।

Remaining topics will be covered in Day-2  Notes.

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