रूस में जनता पर बर्बर अत्याचार किए जा रहे थे। रूस का तत्कालीन शासक जार निकोलस द्वितीय स्वयं एक क्रूर एवं निर्दई जार था।उसने अपने शासनकाल में जनता के साथ अमानवीय व्यवहार किया तथा उन्हें कुचलने के लिए कठोर नीति अपनाई।सामान्य जनता के भाषण लेखन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध लगे हुए थे तथा गैर-रूसी लोगों को रूसी बनाने की प्रक्रिया भी जारी थी।रूस में कुलीन तंत्र का समाज पर व्यापक प्रभाव था यह वर्ग विशेष अधिकारों का दुरुपयोग करता था सामान्य जनता का जीवन भाव ग्रस्त एवं कष्टों से भरा था ।राज्य व सेना के उच्च पदों पर इस वर्ग का एकाधिकार स्थापित था । रूस के सामंत जार की निरंकुशता के समर्थक थे।
रूस में राजकीय अधिकारियों का नैतिक एवं चारित्रिक पतन हो गया था। राजकीय अधिकारी अनैतिक तरीके अपनाकर जनता का आर्थिक शोषण करते थे। इस समय जनता समाजवादी विचारों से प्रभावित होकर अपने अधिकारों की मांग करने लगी थी। रूसी जनता हिंसा पर उतारू थी।जगह -जगह हड़ताल धरना व प्रदर्शन का दौर प्रारंभ हो गया था। इसी बीच 1984 में रूस-जापान युद्ध में रूसी सेना को पराजित होना पड़ा। रूसी सेना की पराजय का समाचार सुनकर रूसी जनता के सब्र का बांध टूट गया। रूस के क्रांतिकारी आंदोलन को इससे और भी बल मिला।