फ्रांसीसीयों का भारत आगमन

फ्रांसीसी राजा लुई-14 के मंत्री कोलबर्ट की सहायता से वर्ष 1664 में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई थी। 

यह एक सरकारी कंपनी थी जिसका संस्थापक कोलबर्ट था।

भारत में फ्रांसीसीयों नें वर्ष 1667 में सूरत में अपनी पहली कंपनी स्थापित की। फ्रांसिस कैरो को पहला गवर्नर नियुक्त किया गया था।  

जुबली कोंडापुर के सूबेदार शेरखान लोधी से पुदुचेरी नामक एक गांव फ्रांसीसी द्वारा प्राप्त किया गया जो बाद में पांडिचेरी के नाम से जाना गया। 

पांडिचेरी में फ्रैंकोइस मार्टिन ने फोर्ट लुइ का निर्माण किया। 

1693 में डचों ने इस पर कब्जा कर लिया लेकिन 1697 में रिजवी की संधि से पांडिचेरी पुनः फ्रांसीसीयों को प्राप्त हो गया। 

द्वितीय कर्नाटक युद्ध के दौरान पांडिचेरी पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया लेकिन बाद में फिर फ्रांसीसीयों को लौटा दिया। 

1690 92 में इनकी कंपनी चंद्रनगर ( बंगाल ) में स्थापित हो गई फ्रांसीसीयों ने चंद्रनगर को बंगाल के सूबेदार शाइस्ता खान से प्राप्त किया था। 

भारत में अंग्रेज तथा फ्रांसीसीयों के मध्य लगातार प्रतिस्पर्धा बनी रही इस प्रतिस्पर्धा के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं। 

- दोनों कंपनियां दक्षिण के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना चाहती थी क्योंकि दक्षिण से ज्यादा धन प्राप्त होता था। 

- दोनों कंपनियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागृत हो गई जिसके परिणाम स्वरूप दोनों अपने राजनैतिक प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना चाहते थे जो कि प्रतिस्पर्धा का एक मुख्य कारण है। 

- यूरोप में फ्रांस एवं ब्रिटेन के बीच अक्सर संघर्ष चलते रहते थे जिसका प्रभाव विश्व के इनके उपनिवेशन पर पड़ता था और इस प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा इसलिए यूरोप के जब भी संघर्ष की शुरुआत होती थी तो भारत में भी इन दोनों कंपनियों के बीच संघर्ष होने लगता था। 

लेख जारी है ......

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