लोक अदालत एवं उसके कार्य

 भारत एक कल्याणकारी राज्य है। कल्याणकारी राज्य अपने सभी नागरिकों के दुख दर्द को दूर करने के लिए कृतसंकल्प है। भारत में गरीबों और पिछड़े वर्ग के लोगों को शीघ्र और कम खर्च पर न्याय दिलाने के लिए कई सक्रिय कदम उठाए गए हैं। संविधान के 42 वेंं संशोधन अधिनियम द्वारा राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि लोगों को कानूनी सहायता मिले जिससे आर्थिक दृष्टि से अक्षम या किसी अन्य अयोग्यता के कारण कोई व्यक्ति न्याय पाने के अवसर से वंचित रह जाता है तो उसके लिए कानूनी सहायता, सक्रिय सामाजिक अभियोग तथा लोक अदालत जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए हैं । ऐसे कार्यक्रम के अंतर्गत व्यवस्था की गई है कि भारत का कोई गरीब नागरिक एक पत्र द्वारा ही मुकदमा दायर कर सकता है । लोक अदालत में ऐसे मुकदमों की सुनवाई की व्यवस्था की गई। 6 अक्टूबर 1985 ईस्वी को दिल्ली में पहली बार लोक अदालत द्वारा मुकदमों की सुनवाई की गई थी और उसी दिन 150 मामले निपटा लिए गए थे तबसे बराबर इस तरह की अदालत की बैठकें हो रही है। लोक अदालत का मुख्य उद्देश्य लोगों को सस्ता न्याय दिलाना है जिससे गरीब लोग अपना मुकदमा दायर कर सकें लोक अदालत में मुकदमों का निपटारा शीघ्र किया जाता है लोक अदालत में मुकदमा दायर करने पर वकील को फीस नहीं देनी पड़ती है तथा तारीख पे तारीख होने से फुर्सत मिल जाती है क्योंकि मुकदमे का निपटारा शीघ्र ही हो जाता है । अधिकतर लोक अदालत में किसी को भी किसी प्रकार की सजा नहीं दी जाती है और मामले को समझौते द्वारा निपटा दिया जाता ।

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