सागरी तरंगों के विषय में जानकारी

सागरीय तरंगे - तरंग जल कणों के लंबवत दोलन को कहा जाता है जिसमें जल अपने ही स्थान पर घूर्णिय गति करता है परंतु ऊर्जा का प्रवाह क्षैतिज रूप से होता है जिससे जल सतह में श्रृगं एवं गर्त जैसी संरचनाएं निर्मित होती हैं। 
      श्रृगं की ऊंचाई या गर्त की गहराई को आयाम कहा जाता है दो श्रृगों के या दो गर्त के मध्य की दूरी को तरंगदैर्ध्य कहते हैं जब तरंग सागर सतह पर मुक्त रूप से प्रवाहित होती है तो इनकी तरंगदैर्ध्य  तथा आयाम समान बने रहते हैं लेकिन वाह्य कारकों के प्रभाव से इनमें अंतर उत्पन्न हो सकता है। 

तरंगों की उत्पत्ति - सागरीय सतह में प्राप्त होने वाली तरंगों का मुख्य कारण पावनें होती हैं पवनों के प्रभाव से तरंगों की उत्पत्ति को हम निम्नलिखित चरणों में देख सकते हैं 

प्रथम चरण - उर्मिकाओं का निर्माण जो कि अनियमित विखंडित तरंगों का आरंभ है। 

द्वितीय चरण - केशिकीय तरंग का निर्माण उर्मिकाएं नियमित होकर केशिकीय  तरंगों का रूप धारण करती हैं जिनकी तरंगदैर्ध्य 2 सेंटीमीटर से भी छोटी पाई जाती है। 

तृतीय चरण - पवन प्रवाह की तीव्रता से केशिकीय तरंगों के आयाम एवं तरंगदैर्ध्य में वृद्धि होती है यह बढ़कर लगभग 7 सेंटीमीटर तक हो जाती है। 

चतुर्थ चरण - सागर सतह में प्रवाहित नियमित दोलनीय तरंगें विस्तृत होकर गुरुत्वीय तरंगों में परिवर्तित हो जाती हैं जिनकी तरंगदैर्ध्य 7 सेंटीमीटर से 20 सेंटीमीटर तक हो जाती है। 

पांचवा चरण - इस चरण में गुरुत्वीय शक्ति के प्रभाव से पवन की अनुपस्थिति में तरंगे नियमित गति से प्रवाहित होती रहती है इन्हीं सागरीय तरंगें कहा जाता है इनकी तरंगदैर्ध्य 20 सेंटीमीटर से लेकर कई मीटर तक हो सकती है। 

तरंगों के प्रकार - तरंगे दो प्रकार की होती है। 

संपोषित तरंग - वह तरंगें जो तटीय क्षेत्रों में निच्क्षेपों का जमाव करती हैं उन्हें संपोषित तरंगे कहा जाता है ।

विनाशी तरंगे - तटीय  निच्क्षेपों  या स्थलाकृति को अपरदित कर विनष्ट करने वाली तरंगों को विनाशी तरंगे कहा जाता है। 

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