1905 ईस्वी की रूसी क्रांति की घटनाएं-

रूसी सेना की पराजय का समाचार सुनकर रूसी जनता के सब्र का बांध टूट गया।सारे देश में जारशाही का नाश हो, युद्ध का अंत हो, क्रांति की जय हो , जनता की जय हो, सर्वहारा वर्ग जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे।इसी बीच 22 जनवरी 1905 ईस्वी को जब मजदूरों के एक संगठन के प्रतिनिधि पादरी गोपन के नेतृत्व में अपने बीवी बच्चों के साथ एक शांतिपूर्ण जुलूस के रूप में जार को एक प्रार्थना पत्र देने उसके सेंटपीटर्सवर्ग स्थित राज महल जा रहे थे तब उन निहत्थे मजदूरों पर निर्ममतापूर्वक गोलियां बरसाई गई । 1000 से अधिक मजदूर मारे गए और हजारों की संख्या में घायल हुए । यह हृदय विदारक घटना रूसी इतिहास में खूनी रविवार के नाम से प्रसिद्ध है । इस भीषण नरसंहार की खबर फैलते ही रूसी जनता हिंसक हो गई तथा स्थान स्थान पर जनता ने विद्रोह कर दिया।
रूसी जनता की हिंसक भीड़ के सामने अक्टूबर में जार को झुकना पड़ा उसने रूसी जनता के सामने घोषणा की कि रूस के सभी नागरिकों को आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की जाती है।प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक रूप से भी स्वतंत्र होगा वह अपनी इच्छा अनुसार किसी भी धर्म का आचरण कर सकेगा। धर्म के आधार पर राज्य की ओर से कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।रूसी जनता को भाषागत स्वतंत्रता होगी तथा किसी भी व्यक्ति को कानून के आधार पर ही दंडित किया जाएगा अथवा जेल भेजा जाएगा। यथाशीघ्र जापान से संधि कर के युद्ध को रोक दिया जाएगा। इस क्रांति के फल स्वरुप जारने रूसी जनता को भाषण प्रेस और संगठन की स्वतंत्रता प्रदान की। तथा ड्यूमा नाम की एक निर्वाचित संसद को कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया।
क्रांति की असफलता-
यार जल्दी ही अपने वादे से मुकर गया। रूस की सेना एवं सरकारी कर्मचारियों के सहयोग से उसने पुनः निरंकुश राजशाही व्यवस्था को बनाए रखने में सफलता प्राप्त की।इस प्रकार 1905 ईस्वी की क्रांति के द्वारा लाए गए परिवर्तन अस्थाई सिद्ध हुए किंतु इस क्रांति ने जनता को जागरूक बनाकर एक और क्रांति के लिए तैयार कर दिया।
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