आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती के द्वारा 1875 में की गई थी। स्वामी दयानंद सरस्वती का बचपन का नाम मूलशंकर था इनका जन्म गुजरात में हुआ था।
स्वामी दयानंद सरस्वती को भारत का मार्टिन लूथर किंग भी कहा जाता है।
'वेदों की ओर लौटो' का नारा इनके द्वारा दिया गया था।
स्वराज की बात करने वाले ये पहले समाज सुधारक थे।
स्वामी दयानंद सरस्वतीे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था।
पूर्णानंद और स्वामी विरजानंद स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु थे।
आर्य समाज का मुख्यालय मुंबई में स्थित है।
इसका मुख्य उद्देश्य वैदिक धर्म को पुनः शुद्ध रूप में स्थापित करना एवं भारत को सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक रूप से एक सूत्र में बांधना था।
शुद्धि आंदोलन - इस आंदोलन के अंतर्गत हिंदू धर्म का परित्याग कर अन्य धर्म को अपनाने वाले लोगों के लिए पुनः धर्म में वापसी के दरवाजे खोले गए थे।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने शुद्र और महिलाओं को वेद पढ़ने , उच्च शिक्षा प्राप्त करने एवं यगोपवित्र धारण करने के पक्ष में आंदोलन चलाया था।
स्वामी दयानंद ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि " कोई कितना भी कहे परंतु स्वदेशी राज्य सर्वोपरि होता है तथा विदेशी राज्य चाहे कितना भी अच्छा हो लेकिन वह सुखदायक नहीं होता है। "
पाखंड खंडन , ऋग्वेद भाष्य , वेद भाष्य भूमिका , अद्वैत मत का खंडन, पंच महायज्ञ यह सभी स्वामी दयानंद की मुख्य पुस्तकें हैं।
स्वामी दयानंद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया तथा स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग सिखाया था।
दयानंद के विषय में एनी बेसेंट ने कहा है कि ये पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि " भारत भारतीयों के लिए है। "
1863 में इन्होंने झूठ धर्मों के खंडन के लिए 'पाखंड खण्डिनी पताका' लहराई थी।
अपनी धर्म के प्रचार प्रसार के लिए इन्होंने संस्कृत भाषा के स्थान पर हिंदी भाषा को चुना था।