भारत में मानसून आने की दिशा क्या होती है तथा भारत में इनका प्रवेश करने का कारण क्या होता है ? आइए जानते हैं ।

भारत में मानसूनी प्रकार की जलवायु पाई जाती है । भारत में ग्रीमष्काल में वर्षा का समय जून में शुरू होता है जो सितंबर माह तक रहता है । जून से पहले मई माह में उत्तर- पश्चिम में तापमान बढ़ने के कारण निम्न वायुदाब की दशाएं और अधिक बढ़ जाती हैं ‌ जून आते-आते यह आरंभ में इतनी शक्तिशाली हो जाती हैं, कि यह हिंद महासागर से आने वाले दक्षिणी गोलार्धों के व्यापारिक पवनों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं । यह दक्षिण- पूर्वी व्यापारिक पवने भूमध्य रेखा को पार करके बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में प्रवेश कर जाती हैं । यहां पर प्रवेश करने के बाद यह भारत के ऊपर विद्यमान परिसंचरण तंत्र में मिल जाती हैं । भूमध्य रेखा की गर्म समुद्री धाराओं के ऊपर से गुजरने के कारण यह अपने साथ पर्याप्त मात्रा में आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं , जो भारत में मानसूनी वर्षा का कारण बनती है । जब यह हवाएं भूमध्य रेखा को पार करती हैं तो उनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम हो जाती है, जो इससे पहले दक्षिण- पूर्व होती है । इसी कारण इसे दक्षिण पश्चिमी मानसून कहा जाता है । हिंद महासागर में विद्यमान दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवने उत्तरी गोलार्ध में प्रविष्ट होकर फेरल के नियम अनुसार अपने दाहिने मुड़कर सामान्य रूप से जब 1 जून को भारत की महेंद्रगिरी (जिसकी ऊंचाई 1654 मीटर है) से टकराकर अचानक वर्षा करती हैं । जून माह के प्रथम सप्ताह के शुरुआती दिनों में मानसून केरल के तरफ से टकराकर वर्षा करता है ।
           दक्षिणी- पश्चिमी मानसून के तीव्र/ तेज होने के कारण मई में भारत के आंतरिक भाग में उठे संवहन तरंगों के पूर्वी जेट बनकर हिंद महासागर पर उतरना है । दक्षिण पश्चिम मानसून महेंद्र गिरी से टकराकर बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर की दो शाखाओं में बैठकर समूचे देश में वर्षा करती हुई राजस्थान पहुंचती हैं ।

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