जैव विविधता पर खतरा

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जैव विविधता पर जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार धरती पर मौजूद 10 लाख से ज्यादा जीवो के विलुप्त होने का संकट बताया गया है ।

यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र समर्थित संस्थान IPBES ने तैयार की है। 

रिपोर्ट के अनुसार 40 % उभयचर और 33 % जलीय स्तनधारी प्रजातियों विलुप्त के एकदम कगार पर हैं। और 5.5 मिलीयन कीटों की प्रजातियों में से तकरीबन 10% पर  संकट मंडरा रहा है। 

रिपोर्ट के अनुसार , लगातार जंगलों की घटती हुई संख्या, बढ़ता कार्बन उत्सर्जन ,जलवायु परिवर्तन ,अनियंत्रित प्रदूषण और मृदा निम्नीकरण तथा बढ़ती आबादी से जैव विविधता को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा है। 

पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों और वनस्पतियों की विविधता को जैवविविधता कहा जाता है इसमें बैक्टीरिया से लेकर पौधे ,जानवर, वन सब कुछ शामिल होता है जैव विविधता से धरती पर मानव के अस्तित्व और स्वामित्व को मजबूती मिलती है। 

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन अत्यधिक प्रदूषण प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से प्रजातियों के आवास नष्ट होते जा रहे हैं और विदेशी प्रजातियों के आ जाने से भी स्थानीय जैवविविधता धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है इसके साथ साथ अवैध शिकार कृषि क्षेत्रों का लगातार विस्तार तटीय क्षेत्रों को नष्ट करना जैसे कारण भी जैव विविधता को संकट में डालने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 


जैव विविधता संरक्षण के प्रयास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी किए जा रहे हैं इस प्रयास में 1971 में यूनेस्को में मानव एवं जैव मंडल कार्यक्रम चलाया गया था और 1992 में कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी प्रोग्राम चलाया गया इस प्रोग्राम के तहत वर्ष 2000 में कार्टागेना जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल मंजूर किया गया और 2010 में इसके अंतर्गत जापान के नगोया के आईजी प्रांत में सम्मेलन भी किए गए सम्मेलन में नगोया प्रोटोकोल और आईची टारगेट्स अस्तित्व में लाए गए। 

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