प्रधानमंत्री
राष्ट्रपति भारत का वैधानिक प्रमुख होता है जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक प्रमुख होता है अर्थात औपचारिक रूप से भारत का प्रधान राष्ट्रपति जबकि सरकार का प्रधान प्रधानमंत्री होता है। कहने का अर्थ यह है कि राष्ट्रपति देश का प्रमुख व्यक्ति होता है लेकिन सभी कार्य करने की शक्ति प्रधानमंत्री के पास होती हैं। राष्ट्रपति सभी कार्यों का निर्वहन प्रधानमंत्री एवं उसकी मंत्रिपरिषद के द्वारा करता है।
• अनुच्छेद 53 में कहा गया है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति की सहायता और सलाह के लिए एक मंत्रीपरिषद होगी जिसका नेता प्रधानमंत्री होगा।
=> प्रधानमंत्री पद की योग्यता
प्रधानमंत्री की योग्यता के बारे में संविधान में किसी प्रकार का स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया है। केवल यह कहा गया है कि प्रधानमंत्री, लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने वाले दल का नेता होगा। इसलिए उसे लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होने के लिए लोकसभा का सदस्य होना आवश्यक है। यदि फिर भी कोई व्यक्ति जो लोकसभा का सदस्य नहीं है लेकिन फिर भी उसे प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त कर दिया जाए तो उसे 6 महीने के अंदर लोकसभा की सदस्यता लेनी होगी।
उदाहरण के लिए जैसे 1967 में इंदिरा गांधी (उस समय राज्यसभा की सदस्य थी ), 1991 में पी.वी नरसिंह राव के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त होने के समय वे लोकसभा के सदस्य नहीं थे लेकिन उन्होंने 6 महीने के अंदर लोकसभा का चुनाव लड़ा और संसद की सदस्यता प्राप्त की। प्रधानमंत्री के लिए लोकसभा की सदस्यता अनिवार्य नहीं है लेकिन उसे संसद के दोनों सदनों (लोकसभा या राज्यसभा) में से किसी का सदस्य होना आवश्यक है।
• यदि व्यक्ति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है तो भी वह प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हो सकता है लेकिन उसे 6 माह के अंदर संसद के किसी एक सदन का सदस्य बनना होगा।
• अनुच्छेद 75 (5) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति 6 महीने के अंदर संसद के किसी सदन का सदस्य है नहीं बनता तो वह प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। इस तरह हम कह सकते हैं कि बाहरी व्यक्ति ने प्रधानमंत्री बन सकता है बस उसे 6 महीने के अंदर संसद के सदन का सदस्य बनाना होगा। यदि वह 6 महीने के अंदर किसी सदन का सदस्य नहीं बन पाता तो उसे अपने पद से त्याग देना होगा।
• 1996 में जब एच.डी देवगौड़ा को प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था तब वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। इसलिए उनकी नियुक्ति को एस.पी आनंद ने न्यायालय में चुनौती दी कि इससे अनुच्छेद 14, 21, 75 का उल्लंघन होता है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 75 (5) के अनुसार यह नियुक्ति विधि के अनुसार है।