हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय में मुख्य न्यायधीश की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष इच्हामृत्यु के अधिकार पर बहस प्रारम्भ हुयी जिसके कारण इच्छामृत्यु एक बार पुन: चर्चा के केन्द्र में है।
इच्छामृत्यु के सम्बंध में ‘लिविंग विल’ से तात्पर्य जीवित रहते हुए इस बात की वसीयत कर जाने से है कि यदि वसीयत करने वाला व्यक्ति लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हो जाता है और मृतप्राय स्थिति में पहुँच जाता है तो उसे जीवन रक्षक उपकरणों में न रखा जाये और मरने दिया जाये।
ज्ञातव्य है कि कॉमनकॉज नामक एक गैर सरकारी संस्था ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है और लिविंग विल का अधिकार प्रदान किये जाने की माँग की है। कॉमनकॉज ने अपनी याचिका में स्पष्ट किया है कि सम्मान से जीवन जीने के अधिकार में सम्मान से मरने का अधिकार भी शामिल है।
‘लिविंग विल’ के सम्बंध में केन्द्र सरकार का मत
- केन्द्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना मत प्रस्तुत करते हुए कहा है कि ‘लिविंग विल’ का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।
- केन्द्र सरकार की ओर से उसका पक्ष रखते हुए एएसजी पी. नरसिम्हन ने कहा कि भारतीय परिवेश एवं समाज में ‘लिविंग विल’ काव दुरुपयोग किया जा सकता है।
- उन्होंने तर्क रखा कि यदि कोई व्यक्ति 30 वर्ष पहले ऐसी वसीयत कर देता है और बाद में उसकी सोंच बदल जाती है अथवा मेडिकल साइंस की प्रगति से स्थिति में परिवर्तन हो तो क्या होगा?
‘लिविंग विल’ के सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय का प्रारम्भिक रूख
- ‘लिविंग विल’ के सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय का क्या मत है यह तो फैसला आने के पश्चात् ही ज्ञात हो सकेगा किंतु संविधान पीठ के प्रारम्भिक रूख से कुछ महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त होते हैं।
- संविधान पीठ ने बहस के दौरान स्पष्ट किया कि वह बीमार व्यक्ति के होश में रहते हुए कष्ट के कारण मृत्यु की माँग करने पर विचार नहीं कर रहा है।
- संविधान पीठ सिर्फ मृतप्राय स्थिति में पहुँच चुके व्यक्ति, जो बेहोशी को हालत में है, के जीवन रक्षक उपकरण हटाने के अधिकार पर विचार कर रहा है। जस्टिस चन्द्रचूड ने तो यहाँ तक कह दिया कि समाज का एक वर्ग बुजुर्गों को बोझ समझता है।
- इस प्रकार स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय का प्रारम्भिक इस ‘लिविंग विल’ के पक्ष में नहीं है।
निष्कर्ष – निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ‘लिविंग विल’ का अधिकार निश्चित रूप से विवादास्पद है। इस सम्बंध में किसी निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए हमें सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करनी होगी।