वर्ष 1983 में दहेज उत्पीड़न के बढ़ते मामलों को देखते हुए भारतीय दंड संहिता आईपीसी में संशोधन करके धारा- 498ए को शामिल की गई तो यह उम्मीद की गई थी । कि यह कानून दहेज पीड़ित महिलाओं के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में कारगर सिद्ध होगा और शुरुआती दौर दो दसकों में ऐसा हुआ भी , जब भारत में दहेज उन्मूलन की दिशा में प्रभावी कदम बढ़ाने शुरू कर दिए मगर विगत एक दशक से इस कानून के दुरुपयोग के मामलों में का तेजी से वृद्धि होने लगी । कई बार इसका दुरुपयोग भी किया जाने लगा ,ऐसा भी देखने को मिला कि पति -पत्नी या ससुराल वालों के बीच मनमुटाव या झगड़े की वजह कुछ और भी थी मगर शिकायतकर्ता महिला पक्ष द्वारा इसे दहेज कानून या महिला हिंसा कानून के तहत दर्ज किया गया जो कि गलत है। दहेज प्रताड़ना घरेलू हिंसा तथा ससुराल में महिलाओं पर अत्याचार उत्पीड़न शोषण से जुड़े अन्य मामलों से निपटाने के लिए भारतीय दंड संहिता आई पी सी की धारा - 498ए , 1983 के अंतर्गत कठोर कानूनी प्रावधान बनाए गए। महिलाओं को उनकी ससुराल में सुखी व सुरक्षित वातावरण मिल सके इसके लिए कानून में पुख्ता व्यवस्था की गई। कानून के अंतर्गत दहेज प्रताड़ना तथा घरेलू महिला हिंसा को संग अपराध की श्रेणी में रखा गया है।