डेनिस ईस्ट इन्डिया कम्पनी
# इंगलिश ईस्ट इन्डिया कम्पनी के बाद भारत के अन्दर जिस यूरोपीय कम्पनी का आगमन हुआ वह डेनिस ईस्ट इन्डिया कम्पनी थी।
# यह डेनमार्क की कम्पनी थी, जिसकी स्थापना 1616 ई० में हुई थी। इस कम्पनी का उद्देश्य भी अन्य ककम्पनीओं की तरह ही व्यापार करना था। परन्तु इस कार्य में वह ज्यादा सफल न हो सकी और अन्तत: इसने ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार तक अपने को सीमित कर लिया।
# डेनिस ईस्ट इन्डिया कम्पनी की भारत के अन्दर पहली फैक्ट्री तन्जौर जिले के ट्रैंक्वेवार में 1620 ई० में स्थापित हुई।
# बाद में बंगाल के सेरमपुर या श्रीरामपुर में अपनी दूसरी फैक्ट्री की स्थापना की।
# सेरमपुर भारत के अन्दर उसकी गतिविधियों मुख्य केंद्र बना। 1745 ई० में इस कम्पनी ने अपनी सभी फैक्ट्रियाँ ब्रिटिश ईस्ट इन्डिया कम्पनी को बेच दीं।
फ्रांसीसी ईस्ट इन्डिया कम्पनी
* भारत आने वाली यूरोपीय कम्पनीओं में सबसे अन्त में आने वाली यूरोपीय कम्पनी फ्रांसीसी ईस्ट इन्डिया कम्पनी थी।
* 1664 ई० फ्रांस के सम्राट लुई चौदहवें के एक मंत्री कौलवर्ट ने फ्रेंच ईस्ट इन्डिया कम्पनी का गठन किया। यह एक सरकारी कम्पनी थी।
* फ्रांसीसी ईस्ट इन्डिया कम्पनी की पहली फैक्ट्री भारत के अन्दर 1668 ई० में सूरत में स्थापित की गयी।
* मरकारा ने भारत में फ्रांसीसीओं की दूसरी कोठी की स्थापना मसूलीपट्टनम् में 1669 ई० में की थी।
* 1690-92 ई० में फ्रेंको मार्टिन ने बंगाल के चंद्रनगर में अपनी एक महत्वपूर्ण बस्ती की स्थापना की, जो कि बंगाल में उसकी गतिविधियों का मुख्य केंद्र था।
* इस प्रकार फ्रांसीसी ईस्ट इन्डिया कम्पनी का भारत के अन्दर प्रभाव बढने लगा था। चूँकि इससे पहले ही ईस्ट इन्डिया कम्पनी ( ई० इ० क० का अर्थ ब्रिटिश ईस्ट इन्डिया कम्पनी है ) भारत में अपना प्रभाव जमा चुकी थी, इस लिए अपने-अपने प्रभुत्व को ले कर दोनों कम्पनीओं के बीच संघर्ष बढ़ते चले गये। यह संघर्ष चूंकि दक्षिण भारत के कार्नेटिक क्षेत्र में हुआ था, इस लिए इस आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष को कर्नाटक युध्द के नाम से जाना गया।
प्रथम कर्नाटक युध्द ( 1746-48 ई० )
* यह युध्द अॉस्ट्रिया के उत्तराधिकार युध्द से प्रभावित था।
* इस समय भारत का फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले था।
* इस युध्द का तात्कालिक कारण - ब्रिटिश एडिमिरल बार्नेट द्वारा फ्रांसीसी जलपोतों को पकड़ लेना बना।
*इस युध्द में कुल मिलाकर फ्रांसीसीओं का पलड़ा भारी रहा। इसी युध्द के एक अंग के रूप में सेन्ट टोमे या अड्यार का युध्द भी लड़ा गया था, जो कि महफूज खाँ के नेतृत्व वाली कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन की सेना और कैप्टन पैराडाइज के नेतृत्व वाली फ्रांसीसी सेना के बीच लड़ा गया। जिसमें फ्रांसीसी सेना विजयी रही।
* यह प्रथम आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष अन्तत: एक्श-ला-शॉपेल की संधि (1748 ई० ) के तहत समाप्त हुआ।
द्वितीय कर्नाटक युध्द ( 1749-54 ई० )
* इस युध्द का कारण हैदराबाद व कर्नाटक के क्षेत्र में हो रहे उत्तराधिकार के संघर्ष में दोनों कम्पनीओं का उलझ जाना था। हैदराबाद में नासिर जंग और मुजफ्फर जंग के बीच तथा कर्नाटक में अनवरुद्दीन और चांदा साहब के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष चल रहा था, जिसमें डूप्ले ने मुजफ्फर जंग और चांदा साहब का पक्ष लिया था। मजबूरी में क्लाइव को नासिर जंग और अनवरुद्दीन का पक्ष लेना पड़ा।
डूप्ले ने मुजफ्फर जंग और चांदा साहब के साथ मिलकर तंजौर के निकट स्थित आम्बूर के युध्द ( 3 अगस्त, 1749 ई०) में अनवरुद्दीन की सेना को बुरी तरह से पराजित किया। अनवरुद्दीन युध्द करता हुआ मारा गया। उसके पुत्र मुहम्मद अली ने त्रिचरापल्ली में भागकर शरण ली। चांदा साहब कर्नाटक का नवाब बना।
इस प्रकार 1751 ई० तक डूप्ले की शक्ति भारत के अन्दर चरमोत्कर्ष पर थी, परन्तु उसका प्रतिकर्ष ( Anticlimax ) आने में भी ज्यादा देर न लगी। डूप्ले भी चांदा साहब के साथ त्रिचरापल्ली पहुँच गया।
क्लाईव ने तब अर्काट को खाली देखकर 1751 ई० में उसका एक प्रसिध्द घेरा डाला, जिसे अर्काट का घेरा कहा गया। रॉबर्ट क्लाइव के अर्काट के घेरे ने भारत में डूप्ले के भाग्य का सर्वनाश कर दिया।
* डूप्ले को फ्राँस बुला लिया गया और उसके स्थान पर गोडेहू को भारत भेजा गया। दिसम्बर 1754 ई० में पाँडिचेरी की संधि के तहत दूसरा आंग्ल-फ्रांसीसी युध्द समाप्त हो गया।
कर्नाटक का तृतीय युध्द (1758-63 ई०)
यह युध्द अॉस्ट्रिया और प्रशा के बीच चलने वाले सप्तवर्षीय युध्द (1756-63 ई०) से प्रभावित था।
* इस युध्द फ्राँस ने जहाँ अॉस्ट्रिया का पक्ष लिया, वहीं इंग्लैण्ड ने प्रशा का पक्ष लिया।
** इसी युध्द के दौरान 1760ई० 'वाँडीवाश का युध्द' लड़ा गया, जिसमें अंग्रेजों ने फ्रांसीसी सेना को बुरी तरह से पराजित कर दिया। इससे फ्रांसीीओं का भारत में प्रभाव समाप्त हो गया।
* इस युध्द के बाद भारत में यूरोप की एक मात्र शक्ति इंग्लैण्ड का वर्चस्व स्थापित हो गया।
* 1763 ई० में यूरोप में अन्तत: पेरिस की संधि के तहत सप्तवर्षीय युध्द समाप्त हो गया और इसी के साथ भारत में तीसरा आंग्ल-फ्रांसीसी युध्द भी समाप्त हो गया।
अध्याय समाप्त !