बिस्मार्क लोकतंत्र ,उदारवाद तथा क्रांतिकारी विचारों का विरोधी था। वह राजतंत्र और सैनिकवाद का प्रबल समर्थक था । वह संविधान को कागज का टुकड़ा कहा करता था । उसका ध्येय प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण करना था। वह जर्मनी में प्रशा का विलीनीकरण नहीं चाहता था , वरन् प्रशा की सीमा को बढ़ाकर उसमें संपूर्ण जर्मनी को आत्मसात करना चाहता था। एकीकरण के मार्ग में वह आस्ट्रिया को सबसे बड़ा बाधक मानता था, वह कहा करता था कि जर्मनी इतना संकीर्ण है कि उसमें आस्ट्रिया और प्रसा दोनों नहीं रह सकते हैं । उसका विश्वास था कि युद्ध द्वारा ही आस्ट्रिया को जर्मनी के बाहर निकाला जा सकता है।
चांसलर बनने के पश्चात उसने जर्मनी का सैन्य संगठन जारी रखा । उसने संसद के विरोध की तनिक भी परवाह नहीं किए। करों द्वारा वह सैनिक खर्च की पूर्ति करता रहा । उसका उद्देश्य प्रसा को यूरोप का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य बनाना था। अपनी नीति को स्पष्ट करते हुए संसद में उसने कहा था कि बड़े बड़े प्रश्न भाषणों और संसदीय मतों द्वारा नहीं वरन रक्त और लोहे से हल होते हैं। अपनी लौह और रक्त की नीति का अनुसरण करते हुए 6 वर्ष के अल्पकाल में उसने 3 युद्धों द्वारा जर्मनी का एकीकरण पूर्ण किया ।
जर्मनी के एकीकरण का संपूर्ण श्रेय बिस्मार्क को है। अपनी कूटनीतिक चालों द्वारा उसने सदैव यही प्रयास किया कि उसके शत्रुओं को किसी अन्य यूरोपीय शक्ति का सहयोग प्राप्त ना हो। यह कूटनीतिक पटुता का परिणाम था कि बिना सैनिक तैयारी के फ्रांस ने प्रशा के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया और बुरी तरह पराजित हुआ । निसंदेह वही जर्मनी का निर्माता था।