:- उपनिवेशीकरण की भावना- उन्नीसवीं सदी के अंत तक प्रायः सभी शक्तिशाली राष्ट्र अधिक से अधिक उपनिवेश बनाने की दौड़ में शामिल हो गए। जर्मनी इस दौड़ में बाद में आया, किंतु उसकी औद्योगिक उन्नति से अन्य राष्ट्र भयभीत होने लगे। जापान भी इस स्पर्धा में सम्मिलित हो चुका था अत: उपनिवेशीकरण की भावना ने भी प्रथम विश्व युद्ध के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
:-आपसी तनाव व कड़वाहट- एक दूसरे की आगे बढ़ जाने की प्रतिस्पर्धा ने यूरोपीय देशों को इतना अंधा बना दिया कि वे दूसरों के इलाके पाने के लिए आपस में गुप्त समझौते भी करने लगे, उन समझौतों का अक्सर भंडाफोड़ हो जाता था । इससे हर देश में भय एवं शंका का वातावरण बन जाना स्वभाविक था।
:-तात्कालिक कारण- बीसवीं सदी के द्वितीय दशक में यूरोपीय वातावरण तनावग्रस्त तो था ही, इसी समय घटित एक घटना जिसमें ऑस्ट्रिया के राजकुमार आर्कड्यूक फ्रांसिस अपनी पत्नी सहित बोसनिया की राजधानी सेराजेवो गए , जहां पर 28 जून 1914 को गोली मारकर पत्नी सहित उनकी हत्या कर दी गई। आस्ट्रिया ने अपने राजकुमार की हत्या की जिम्मेदारी सर्बिया पर डालते हुए युद्ध की चुनौती दी। जर्मनी ने ऑस्ट्रिया का व रूस ने सर्बिया का पक्ष लिया।इस घटना के परिणाम स्वरूप 28 जुलाई 1914 ईस्वी को आस्ट्रिया ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।इधर रूस ने स्लाओ जाति की रक्षा के लिए सर्बिया का पक्ष लेकर आस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया।1 अगस्त 1914 ईस्वी को जर्मनी ने आस्ट्रिया के पक्ष में तथा 3 अगस्त को फ्रांस और इंग्लैंड ने सर्बिया के पक्ष में युद्ध की घोषणा कर दी। अनेक दूसरे देश भी लड़ाई में शामिल हो गए।सुदूर पूर्व में जर्मनी के उपनिवेशों को अपने कब्जे में करने के उद्देश्य से जापान ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस प्रकार इन घटनाओं ने संपूर्ण विश्व को युद्ध की आग में झोंक दिया और प्रथम विश्व युद्ध अपरिहार्य हो गया।