प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम-२

Ashish Verma:
एशिया और अफ्रीका में स्वाधीनता आंदोलन- प्रथम विश्वयुद्ध की घटनाओं ने सारे संसार को प्रभावित किया । विश्व में दो ध्रुवीय व्यवस्था का जन्म हुआ।अमेरिका विश्व मंच पर एक शक्तिशाली देश बनकर उभरा तो दूसरी तरफ सोवियत रूस भी एक महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। सोवियत रूस ने स्वाधीनता आंदोलनों को समर्थन देने की घोषणा की, जिससे एशिया और अफ्रीका में पहले से चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों की शक्ति बढ़ गई।
सामाजिक परिणाम- युद्ध काल में अनिवार्य सैनिक सेवा लागू होने के कारण सभी देशों के बहुत से नागरिक सेना में भर्ती हो गए । प्रथम विश्वयुद्ध में सैनिकों के भारी संख्या में हताहत होने से महिलाएं घर की चहारदीवारी से निकलकर सामाजिक जीवन में अग्रसर हुई इससे महिलाओं की स्वतंत्रता में वृद्धि हुई।
शांति के प्रयास- प्रथम विश्व युद्ध के महा विनाशकारी परिणाम को देखकर संसार के सभी देश भयाक्रांत हो गए। सभी देश अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना के लिए तथा भविष्य में इस प्रकार के प्रचंड युद्ध की विभीषिका से बचने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना हेतु सहमत हो गये। अतः अमेरिका के राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन के प्रयासों से लीग आफ नेशंस नामक एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना हुई।

पेरिस का शांति सम्मेलन- जनवरी 1919 और जून 1919 ईस्वी के बीच विजेता शक्तियों का 1 सम्मेलन पेरिस में आयोजित हुआ।यदि इस शांति सम्मेलन में दुनिया के 27 देश भाग ले रहे थे किंतु शांति संधियों की शर्तें केवल 3 बड़े देश फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका ही तय कर रहे थे।इस शांति सम्मेलन में मित्र राष्ट्रों के 80 प्रतिनिधि शामिल हुए जिनमें अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन , ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लायड जार्ज, और फ्रांस के प्रधानमंत्री जार्ज क्लीमेंसो एवं इटली के ऑरलैंडो व जापान के सेओन्जी प्रमुख थे।सम्मेलन में पराजित देशों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया तथा रूस को भी सम्मेलन से बाहर रखा गया।

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