भारतीय संविधान की उद्देशिका-
”हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिको को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत, दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्णित करते हैं।“
42वें संविधान संशोधन के द्वारा, पहले पैरा में दो शब्द समाजवादी और पंथनिरपेक्ष व छठे पैरा में अखण्डता शब्द अन्त स्थापित किया गया।
प्रमुख बाते:-
संविधान की प्रस्तावना को ‘संविधान की कुंजी’ कहा जाता है।
प्रस्तावना को न्यायालय में प्रवर्तित नहीं किया जा सकता।
प्रस्तावना के अनुसार संविधान के अधीन समस्त शक्तियों का केन्द्र बिन्दु अथवा स्रोत भारत के लोग ही है।
उद्देशिका से सम्बन्धित
पंथ निरपेक्ष-
;पद्ध निजी धर्म नहीं होता।
;पपद्ध सभी धर्मो को समान महत्व भेदभाव नहीं
;पपपद्ध वह धार्मिक मामलों में तटस्थ रहता है।
लोकतन्त्र - ”जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए“
422 ई0पू0 में बेल्जिमय ने कहा था।
आधुनिक युग में कहा-अब्राहम लिंकन ने
गेट्सवर्ग ने 1863 ई0 में कहा।
प्रश्न- क्या उद्देशिका संविधान का भाग है? क्या इसमें संशोधन किया जा सकता है?
उ0 हाँ है, इसमें संशोधन किया जा सकता है। (1973 केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य)